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Thursday, January 2, 2020

January 02, 2020

Ashtaang Yoga Aur Kundalini Jaagran...

अष्टांग योग - षड़चक्र - कुंडलिनी जागरण



मनुष्य देह - भोग और मोक्ष का उत्तम साधन.... निराकार ब्रह्म शिव ने पाच तत्व -भूमि,जल,अग्नि,
वायु और आकाश से १४ ब्रह्माण्ड बनाए.उनमे देव,दानव,यक्ष,किन्नर,चारण,गान्धर्व और मानव सृष्टि बनायी.बाकी सभी कोई एक या दो तत्व से बने हे.एक मनुष्य देह पाच तत्व से बनाया हे.इसलिए ही पाचो तत्व देवता को पाके ही ब्रह्म प्राप्ति हो सकती हे.इसलिए ही कहेते की मनुष्य देह देवताओ को भी दुर्लभ हे.पाचो तत्व से मानव देह बना हे

 मतलब उन पाचो तत्व के देवता - गणेश,शक्ति,सूर्
य,नारायण और रूद्र हमारे शरिर में मोजूद हे.शरिर में पाच चक्र हे वो तत्व देवता की शक्ति वह स्थित हे.हमारे रूशी-मुनियों ने हमें उनका जागरण कर भोग और मोक्ष का मार्ग दिखाया हे,उनको ही कहेते हे कुण्डलिनी शक्ति का जागरण और उपासना.कुण्डलिनी शक्ति जो मूलाधार चक्र में स्थित हे वह से ही जीवन शक्ति का प्रवाह पाचो चक्रों में बहेता रहेता हे.इस पाचो चक्र के तत्व से शरीर की दश इन्द्रिया का सञ्चालन होता हे.जेसे मूलाधार चक्र = भूमि तत्व-देवता गणेश - इष्ट ब्रह्मा-से नाक याने धार्नेंद्रिय और कामेन्द्रिय इस दोनों का संचालन होता हे.भूमिगत हर प्रकार का सुख उनसे प्राप्त किया जा सकता हे. स्वाधिष्ठान चक्र = जल तत्व -देवता ब्रह्मा-इष्ट नारायण-से जीभ [जिह्वा]और क्रोध इस दोनों का संचालन होता हे.हर प्रवाहि रस-रूप की सारी सिध्धिया उसके उपासन से पाई जाती हे.मणिपुर चक्र = अग्नि तत्व -देवता विष्णु-इष्ट रूद्र-से आँख और लोभ का संचालन होता हे.उपासना से दिव्य द्रष्टि याने लाभप्रद मार्ग अपने आप मिलता हे.अनाहत चक्र =वायु तत्व -देवता शिव-इष्ट इश्वर से स्पर्श और मोह का संचालन होता हे.उपासना से निर्मोही बनके विश्व की हर सम्पदा पायी जाती हे.विशुद्ध चक्र =आकाश तत्व -देवता जीव-इष्ट अर्धनारीश्वर सदाशिव से कान [कर्ण]और अहंकार का संचालन होता हे.उपासना से लय योग ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती हे.इस पाच चक्रों की जाग्रति होते ही आज्ञा चक्र में गुरु और परम शिव की शक्ति जागृत होती हे और नाद का प्रगति होता हे.और कुण्डलिनी शक्ति इन सारे चक्रों को भेद के सहस्त्रार चक्र में पहोचाते ही जीव शिव बनता हे.परः ब्रह्म और महादेवी में विलीन होता हे.इस पाचो चक्रों की उपासना के विषय में चक्र के यंत्र दिए है

क्रिया, यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार, ध्यान,धारणा,और समाधि का विषय समजाया हे.......

[१] यम:- सत्य,अहिंसा,दया,क्षमा,मिताह
ार,ब्रह्मचर्य का पालन....

[२] नियम:- जप,तप,व्रत,पूजा,दान,श्रद्धा ,संतोष,सिद्धांत,श्रवण....

[३] आसन:- स्वस्तिकासन,गोमुखासन,वीरासन,पद
मासन,सिंहासन,भद्रासन,मुक्तासन,मयूरासन,ये सब आसान करने से शरीर में जीवन पर्यत कभी भी रोग नहीं होते.

[४] प्राणायाम:- एक आसन में शरीर सीधा रखके बेठे.दाई और की नाक की नस्कोरी से १२३४५६७ गिनते स्वास भरे,स्वास खिचते समय लगे समय से चारगुना समय तक स्वास रोके और दुगने समय बायीं और के नस्कोरी से स्वास छोड़े.अब बायीं और से इसी क्रम से स्वास भरे और दाई और से चोदे.ये एक प्राणायाम हवा.ऐसे चार प्राणायाम करे.धीरे धीरे समय bahda सकते हे....

[५] प्रत्याहार:- स्वस्तिकासन में बैठके लंबा स्वास भरके प्राण को पैर के के अंगुलियों से लेके सर की शिखा तक प्राण रोकना उसे प्रत्याहार कहेते हे...

[६]धारणा:- देह के अंदर पाचो तत्व के देवता की अलग अलग अन्गोमे बिराजे हे एसी धारना करना.

[७] ध्यान:- हमारे रुदय में बेठे शिव में मन लगाना ,वहां चीत को एकाग्र करना .

[८]समाधि:- ध्यान करते करते सारी क्रिया भूल हम शिवमय बन जाते हे वो हे समाधि....

थोड़े दिनोंकी प्रयत्नों से ये सब आसानीसे हो सकता हे.अष्टांग योग अनुसरण के बाद कोई भी उपासना सरलता से की जा सकती हे.आप आपके गुरदेव या कोई भी मार्गदर्शक से विशेष जानकारी पा के उपासना कर सकते हे.

( 1 ) मूलाधार चक्र: -

लं ..बीज का ध्यान कर महागणपति की करो उपासना - पंचतत्व में भुमितत्व के अधिष्ठाता हे महागणपति.शारीर में स्थित मूलाधार चक्र में उनका ध्यान किया जाता हे.मूलाधार चक्र रक्तवर्ण और चतुष्कोण हे.लं बीज हे.महागणपति के गं गणपतये नमः इस मन्त्र से उपासना करके मूलाधार चक्र की महागणपति की पृथ्वीतत्व की शक्ति का जागरण किया जाता हे.भूमि तत्व से सारी भौतिक सुख-समृद्धि मिलती हे.योग्य मार्गदर्शक से निति-नियम जानके ये उपासना कर सकते हे.इस उपासना से जीवन में हर प्रकार की सुख समृद्धि प्राप्त कर सकते हे....

( 2 ) स्वाधिष्ठान चक्र: -

स्वाधिष्ठान चक्र में वं बीज की उपासना - कुण्डलिनी महाशक्ति जागरण के प्रकरण में शरीरस्थ चक्रों के विषय में बताया हे.स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्व हे.वं बीज हे.तत्व देवता ब्रह्मशक्ति हे.इश्वर नारायण हे.जिहव[जीभ]और क्रोध इन्द्रिय हे.आगे के प्रकरण में बताए अनुसार अष्टांग योग का अनुसरण करते हुवे स्वस्तिकासन में टटार बेठे और स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्व में वं बीज का ध्यान करते हुवे उसी स्थान पे वं बीज का जाप करो.इस ध्वनी से धीरे धीरे चक्र की शक्ति का जागरण होगा.जीभ,स्वाद,वाणी,क्रोध पर संयम आएगा.शक्ति जागरण के साथ ही रीढ़ही-सिद्धि सह सुख समृद्धि प्राप्त होगी.सद्गुरु के मार्गदर्शन में सफलता प्राप्त होती हे...

( 3 ) मणिपुर चक्र: -

मणिपुर चक्र में रं बीज की उपासना और हर प्रकार के असाध्य रोगों से भी मुक्ति.निरोगी और तन्दुरस्त और दीर्घायु जीवन का रूशी-मुनियों का यही रहस्य हे.नाभि में स्थित सुवर्ण रंगी चक्र में रं बीज हे.तेज[अग्नि]तत्व हे.तत्व देवता विशु हे.इश्वर रूद्र हे.अष्टांग योग के अनुसरण के साथ ही नाभि में सूर्य और चंद्र नाडी के संयोजन से प्रचुर जीवन शक्ति का पादुर्भाव होता हे.जो किसीभी प्रकार के रोग का नाश करके दीर्घायु प्रदान करती हे.इन्द्रिय आँख और लोभ हे.दिव्य द्रष्टि और दीर्घ दष्टि प्राप्त होने के कारण आगे भविष्य को उज्वल बनाया जा सकता हे.मणिपुर चक्र में रं के नाद से सुर्य जेसी तेजस्वीता प्राप्त होती हे.रं बीज से शरीर में अग्नि तत्व की जागृति से जठराग्नि सतेज होने से पाचन क्रिया श्रेष्ठ बनके शरीर के हर अंश को तेजस्वी बनाती हे.शरीर के रोगों में ९० प्रतिशत रोग पेट से ही होते हे उनका शमन होता हे.मणिपुर चक्र की जागृति के साथ अणिमाँदि सिद्धिया प्राप्त होती हे.मणिपुर चक्र की जागृति के साथ ही साधक के चित-वृति दिव्यता से भरपूर हो जाती हे और आगे की सारी उपासना अपने आप ही सम्पन होती हे.....

( 4 ) अनाहत चक्र: -

अनाहत चक्र में यं बीज की उपासना.=मनुष्य के शरीर में अनाहत चक्र रदय में हे.हरकोई मनुष्य अपने इष्ट का ध्यान हमेशा रदय में करता हे.रक्त रंगी अनाहत चक्र में वायु तत्व में यं बीज स्थित हे.तत्व के देवता महारुद्र और इष्ट इश्वर हे.आदित्य-सूर्य कारक हे.चमड़ी,स्पर्श और मोह इन्द्रिय हे.यं बीज का ध्यान करने से और यं ध्वनी नाद से इस चक्र की जागृति होते ही सर्वलोक आकर्षित होता हे.आत्म-शक्ति प्रबल होती हे.सिद्धिया स्वयं आती हे.हर प्रकार के भोग भुगतते हुवे भी मनुष्य विरक्त रहेता हे.मानुष लोक के अलावा अन्यलोक की दिव्य सृष्टि से संपर्क होता हे.सत्य,अहिंसा,
दया और प्रेम इन चारों सद्गुणों के के साथ मनुष्य धेर्य्वान बनता हे.इस चक्र की जागृति के साथ ही ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग सरल बन जाता हे....

( 5 ) विशुद्ध चक्र: -

विशुद्ध चक्र हं बीज की उपासना = मानव शरीर में कंठ के पास विशुद्ध चक्र हे.धूम्र वर्ण हे.आकाश तत्व में हं बीज स्तित हे.तत्व देवता जीव हे और इष्ट सदाशिव हे.कर्ण[कान]और अहंकार इन्द्रिय हे.इस चक्र की उपासना से हमारे शरीर के शिव और शिवा का तत्व समजा जाता हे.लय योग साध्य हो जाता हे.ब्रह्माण्ड के हर लोक से संपर्क बनता हे.पश्यन्ति वाणी साध्य हो जाती हे.मिथ्याभिमान का नाश होता हे और अहं ब्रह्मासमी तत्व का ज्ञान होता हे.इस तत्व की जागृति के साथ ही अग्या चक्र के तत्व देवता गुरु की कृपा होती हे और सहस्त्रार चक्र में परःब्रह्म की अनुभूति सहज हो जाती हे.परमहंस कक्षा की स्थिति में स्वयं ही ब्रह्म अंश बना देती हे.शरीर की उपासना की इस यौगिक प्रक्रिया को विस्तृत नहीं लिखा जाता.क्युकी हर मनुष्य केलिए प्रक्रिया भिन्न हो जाती हे 

Wednesday, December 4, 2019

December 04, 2019

Kya Satguru Kabeer Bhagwan / parmatma they? Kya Sant Kabeer kisi mantra ka jaap karte they?

मैंने एक कबीर पंथी और ज्ञानी साधक से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न किये थे, यहाँ उनके द्वारा दिए गए उत्तरों का संकलन है। आप भी इन्हें पढ़ सकते हैं: -


1. क्या सृष्टि के सृजन के बाद कभी ऐसा समय रहा । जब अधिकतर लोग परमात्मा को जानते थे और परमात्मा की स्तुति करते थे । परमात्मा को प्राप्त करने की उनकी विधि क्या थी ?

इच्छा काया इच्छा माया, इच्छा जगत बनाया ।
इच्छा पार जो हैं विचरत, उनका पार न पाया ।

उत्तर - सृष्टि का सृजन माया के अभाव में कभी संभव नहीं था । न ही कभी होगा । इसलिये प्रथमतः सृजन के दौरान ही आदिमाया, माया, योगमाया जैसे अस्तित्व निर्मित हो गये । इसको सरल उदाहरण के रूप में ऐसे समझ सकते हैं । जैसे एक चित्रकार खाली कागज ( मन, चित्ताकाश या चित्त ) पर प्रथम कुछ रेखायें ( विचार ) उकेरता है । उनसे आकारों ( ढांचा रचना ) का निर्माण होता है । फ़िर उसमें ( भावना ( ओं ) के ) रंग ( तीन गुण ) स्वेच्छानुसार भरता है । और अन्ततः उसका इच्छित चित्र ( वासना ) निराकार ( कोरा कागज ) से साकार ( रंगीन ) हो जाती है । और वह वस्तु चित्र सत्य सा लगने लगता है । जबकि कोरे कागज पर कुछ रेखायें और रंगों का संयोजन ही है । वहाँ यथार्थिक कुछ नही है ।
आशय यह है कि जो भी संकल्पित जीव ( सभी कुछ, महाशक्तियां भी ) बने । वो माया के आवरण में ही थे । और परमात्मा सबसे फ़िर भी अलग ही रहा ।

अब महत्वपूर्ण यह है कि मनुष्य को छोङकर जो भी देव, बृह्म आदि अस्तित्व थे । उनका ढांचा सीमित था । उसमें विराट या अनन्त था ही नहीं । और उनका परिपथ ( सर्किट ) अथवा यन्त्र ही भिन्न था । जानने के अनुरूप नहीं था । अतः कह सकते हैं कि उन्होंने जो जाना, बरता, वह अनन्त परमात्मा की एक कला या कुछ अंश मात्र था ।

और मनुष्य में यह सब कुछ था । पर वह ताले या तालों में बन्द था । जिसकी चाबी सम्बन्धित अधिकारी या गुरु के पास थी । जो एक निर्धारित नियमों की औपचारिकता के बाद ही मिलती ।

अतः निःसंदेह ही कहा जा सकता है कि आदि सृष्टि के ठीक एक क्षण बाद का भी समय ऐसा नहीं था कि बहुत लोग परमात्म मूल को जानने वाले हों । क्योंकि मायावश वे बहुत दूर हो गये थे । ऐसा बहुत आवश्यक था । क्योंकि तभी सृष्टि रह सकती थी ।

स्तुति - विभिन्न जीव उपाधियों द्वारा जो भी स्तुति हुयी । वह परमात्म स्तुति ही थी । पर उससे मूल को जाना नहीं जा सकता था । मूल को वही जान सकता था । जिसे वह ( कारणवश ) चुनता था ।

जेहि जाने जाहि देयु जनाई, जानत तुमहि तुमहि हो जाई ।
यह फ़ल साधन से नहि होई, तुम्हरी कृपा पाई कोई कोई ।
विधि - परमात्मा को प्राप्त करने की कोई विधि नहीं है । हाँ उसकी कृपा हो जाये । ऐसा भाव निरन्तर रखना, को शब्दों के घुमाव में विधि कह सकते हैं । स्मरण रहे - परमात्मा सिर्फ़ भाव का भूखा है । और कुछ उसे तृप्त नहीं करता ।

2. परमात्मा ने कब कब अवतार लिया । अथवा परमात्मा ने कब और किस तरह लोगों को अपने बारे में बताया ?

साहिब तेरी साहिबी घट घट रही समाय, ज्यों मेंहदी के पात में लाली लखी न जाये ।

उत्तर - परमात्मा ने कभी अवतार नहीं लिया । लेकिन परमात्मा प्रकट अवश्य होता है । यह किसी भी सन्त ह्रदय में एक कला से लेकर बहुकला अथवा अनन्तकला प्रकट होता है । वह सन्त उसी अनुसार उसको कहता है । पूर्ण परमात्मा या अनन्त परमात्मा वाणी का विषय नहीं बन पाता । अतः निर्वाणी या अवर्णनीय ही रहता है । वास्तव में यह ह्रदय से ह्रदय में प्रकट होता है । यद्यपि बहुत से सन्तों ने इसका अधिकाधिक सटीक वर्णन करने का प्रयास किया । पर सफ़ल नहीं हुये । और दूसरे उन्हें इसका विशेष लाभ नजर नहीं आया । क्योंकि जैसी जीव सृष्टि है । उसमें उपलब्ध वर्णन जीव स्तर पर काफ़ी है । और यदि कोई जीव ज्ञान मार्ग पर बढता है । तो मूल सूत्रों के अनुसार अनुभव करता हुआ जानने लगता है । ऐसे जीवों ने भी प्रारम्भ में उत्साह से इसका वर्णन करना चाहा । पर शीघ्र ही वह समझ गये । यह सिर्फ़ गूंगे का गुङ है । जो सिर्फ़ खाने वाला ही जान सकेगा ।

इसलिये इसका विशेष इतिहास या वैज्ञानिकता लिखित में नहीं है । कब और किस तरह से की बात यह है कि आदि सृष्टि से ही जो खेल प्रचलित हुआ । उसमें भक्ति सर्वोपरि थी । वास्तव में यह मायिक खेल बच्चों के छुआछाई या चोर सिपाही की भांति ही था । जो आदि सृष्टि के समय जैसा था । वैसा ही आज भी है । इसी क्षण भी है ।

कह सकते हैं - लाखों करोङों युगों में कोई समय ऐसा आता है । जब अनन्तकला परमात्मा किसी बिरले में प्रकट होता है ।
हर घट तेरा साईयां सेज न सूनी कोय, बलिहारी उन घटन की जिन घट प्रगट होय ।

अवतार - ईश्वरीय या भगवद शक्तियां लेती हैं । मुख्य अवतार जैसे राम कृष्ण आदि आधे अंश से होता है । फ़िर भी इसे पूर्णावतार कहते हैं । विभिन्न नैमित्तिक कार्यों हेतु अनेक अंशांश अवतार जैसे वराह, मोहिनी, रुद्र आदि हुये, होते रहते हैं । इनकी संख्या लाखों में होती है ।

3. वास्तविक मोक्ष क्या है । क्या सतलोक जाना ही मोक्ष है ? जो अविनाशी धाम पहुंच जाते हैं । तो वहाँ वे किस अवस्था में रहते हैं कि अनन्त समय तक उबाऊपन नहीं आता ?

उत्तर - केवल और एकमात्र परमात्म स्थिति को प्राप्त हो जाना ही असली मोक्ष है । मोक्ष शब्द मोह-क्षय..मोःक्षःय से बना है । इस स्थिति का कोई वर्णन मेरी नजर में आज तक नहीं आया । कबीर को छोङकर अधिकांश ने शून्य समाधि या शून्य स्थिति को परमात्म स्थिति कह दिया । जो बेहद हास्यास्प्रद है ।

कबीर ने भी सतपुरुष और पारबृह्म से अधिक ( मेरी जानकारी में ) वो भी कुछ संकेतों में, नहीं कहा । अनन्त शब्द का प्रयोग अवश्य किया । पर अनन्त क्या ? यह नहीं बताया । या फ़िर अभी तक मेरी जानकारी में नहीं है । क्योंकि कबीर की वाणियां बहुत हैं । जिनमें बहुतों में मिलावट भी है । और बहुत सी लोप हो चुकी हैं ।

पर एक बात अवश्य है । अभी तक उपलब्ध वाणियों में कबीर से.. अधिक, सटीक और सार कोई नहीं बोल सका । कबीर जैसी बेबाक और खरी खरी तो दूर की बात है ।

सतलोक पहुँचा जीव स्थिति अनुसार आवागमन से रहित, मनः दुर्गुणों से परे, काग वासनाओं से दूर आनन्द की अवस्था में एक पक्षीय होता है । त्रिलोकी जैसा कल्पित पक्ष नहीं होता । अविनाशी धाम में अमृत्व, प्रकाश, आनन्द और हंस अवस्था होती है । बाकी यहाँ की दीप भूमियां इतनी विशाल और अनेकानेक रासरंग विचित्रताओं वाली हैं कि उबाऊपन कैसे हो ? यह मैंने सिर्फ़ समझाने हेतु लिखा है । दरअसल हंस काय में उबाऊपन जैसा कुछ होता ही नहीं । ये मनः चेष्टा के अंतर्गत ही है ।

इस बात को ऐसे समझें कि किसी तरह आपको निरन्तर युवा अजर निरोगी काय और सभी सुख सुविधायें और स्वेच्छा चरण विचरण प्राप्त हो । तो इसी प्रथ्वी पर लाखों वर्षों तक उबाऊपन नहीं होगा । क्योंकि विचित्रतायें और बहुरंगता और रहस्य और बहुभोग ये अहसास तक नहीं होने देंगे कि लाखों वर्ष हो गये । प्रथ्वी ( मृत्युलोक ) के एक एक जगह की ही विचित्रता विभिन्नता और रहस्य ज्ञान विज्ञान को अनुभूत करने हेतु युगों का समय चाहिये । फ़िर अन्य अदभुत की तो बात ही कैसे हो ?

सबसे बङी और खास बात अविनाशी धाम के जीव आदेशानुसार और स्वेच्छा से भी विभिन्न सृष्टियों में गर्भरहित आवागमन करते रहते हैं । इसलिये परिवर्तन और नित नूतन के कारण उबाऊपन जैसा कुछ हो नहीं सकता । सब कुछ खेल जैसा होता है ।

4. क्या परमात्मा निराकार और साकार दोनों हो सकता है ? यदि हाँ, तो दोनों में से किसकी भक्ति श्रेष्ठ है । और दोनों से मिलने वाले फल में क्या अंतर है ?

उत्तर - हाँ कहो तो है नहीं, ना कही न जाये । हाँ ना के बीच में साहिब रहा समाय ।

परमात्मा को निराकार खास इसलिये कहा है कि उसका कोई आकार रूप रंग नहीं है । बाकी न वह निराकार है न साकार है । बल्कि वह - है । जो है - सो है । इसलिये निराकार बस इसलिये कह दिया कि वह साकार हरगिज नहीं है । लेकिन निराकार है । ऐसा भी नहीं है । दूध में छिपा घृत और मेंहदी में छिपी लाली और रगङ में छिपी अग्नि की भांति ही वह प्रकट भर होता है । प्रकट होते समय दर्शनीय और आवेशी होता है । बाकी फ़िर अगम अगोचर ही रहता है । ध्यान दें..घी लाली अग्नि ये फ़िर लोप हो जाती हैं ।

अब क्योंकि वह निराकार साकार है ही नहीं । तो फ़िर इनकी भक्ति कैसे । हाँ दोनों भक्तियों की अपनी श्रेष्ठता है । पूर्व में बिना साकार के निराकार भक्ति संभव ही नहीं । फ़िर भी गुणात्मक और घटक पदार्थों के अनुसार तुलना की जाये । तो निराकार श्रेष्ठ है । क्योंकि साकार के बाद उच्चता कृम में यही है ।

यदि भक्ति साकार ही रही । तो द्वैत बना रहेगा । निराकार द्वैत को अद्वैत में बदलता है । साकार की तुलना में निराकार भक्ति के फ़लों में राई पहाङ जैसा अन्तर है । निराकार ही ‘होने’ में फ़िर ‘है’ में ले जाती है ।

5. क्या परमात्मा को केवल मंत्र जप से ही पाया जा सकता है ? यदि कोई परमात्मा के लिए प्रेम रखे । और आश्रय ले । परन्तु मंत्र न जपे । तो उसकी गति क्या होगी ?

उत्तर - यह गुन साधन ते नहिं होई, तुम्हरी कृपा पाय कोई कोई।

परमात्मा को किसी तन्त्र मन्त्र से जाना, पाया नहीं जा सकता। पर थोङा सा अलग शब्दों में कह सकते हैं कि इसका एक तरीका है । और सदगुरु है । और कृपा है । और भक्त का समर्पण होना है । और भक्त का ही भाव पूर्ण होना है ।
मन्त्र जप या निर्वाणी मन्त्र या अजपा जप, जन साधारण को विषय समझाने हेतु सर्वाधिक उपयुक्त शब्दों में कहे गये हैं । क्योंकि प्रारम्भिक स्थितियों में बात समझाने के लिये शब्दों और खास शब्दों की आवश्यकता होती ही है । वैसे स्वयं निशब्द के लिये शब्द कैसे हो सकते हैं । यानी वहाँ तक जाने के संकेत और पूर्व साधन ।

प्रेम - मन की सिर्फ़ आठ अवस्थायें होती हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ज्ञान, वैराग । जाहिर है इनमें प्रेम का भाव या अवस्था है ही नहीं । सांसारिक लोग जिसे प्रेम कहते या समझते हैं । वह दरअसल स्वार्थ पूर्ण सम्बन्ध या चाहना या या सम्मोहक आकर्षण का मिला जुला भाव है । जो उपरोक्त में ‘काम’ श्रेणी में आता है । और कारणवश उत्पन्न होता है । पर क्योंकि इसमें लोभ, मोह, मद आदि भावों का भी स्थिति अनुसार अंश होता है । इसलिये इसे ‘प्रेम’ कहने लगते हैं । जो भारी अज्ञानता है । मन का नहीं, परन्तु जीव का नौवां भाव ‘प्रेम’ है । जो एक अविरल धारा है । जिसे चेतना भी कहते हैं । इसी में प्रविष्टि होने पर समत्व शिवत्व जैसे समग्र भाव उदित होते हैं ।

सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रनाम जोरि जुग पानि ।
इसी भाव में प्रविष्टि के बाद ही सम्भव है । ये चेतना में रमण करने या निर्वाणी मन्त्र में लय के बाद अनुभूत होता है । अतः बिना इसको जाने, बिना इसको हुये कोई भी परमात्मा या किसी अन्य से प्रेम कर ही नहीं सकता ।

गौर से सोचिये - आप परमात्मा से प्रेम क्यों कर रहे हैं या करेंगे ? उत्तर में स्वार्थ ही निकलेगा ।

यह प्रेमधार ही परमात्मा तक ले जाती है । पर इस पनघट की डगर अति कठिन है ।

- लेकिन फ़िर भी यह बात मान कर चलते हैं कि परमात्मा से सिर्फ़ प्रेम रखें । और मन्त्र जप न करें ।

तो वास्तव में यह होगा कि यदि आप प्रेम ( भाव ) से शुरू करते हैं । तो मन्त्र की उच्छवास आदि डूबना, भाव बेहोशी, भाव समाधि जैसी क्रियायें स्वतः होने लगेंगी । और नयी क्रियाओं से घबराकर गुरु के पास जाना ही होगा । और इसके बजाय यदि आप निर्वाणी मन्त्र से शुरू करते हैं । तो प्रगाढ प्रेम उदय होकर बढता ही जायेगा । तरीका कोई अपनायें । सदगुरु के बिना सफ़ल नहीं होगा ।

6. यदि कोई संसार में परमात्मा का ज्ञान रखता हो । या उसको प्राप्त करने का उपदेश दे । तो सृष्टि के जो बडे देवता ब्रह्मा, विष्णु या शंकर आदि देवता भी तो जान जायेंगे । तो वो परमात्मा को पाने का प्रयास नही करेंगे ?

उत्तर - जैसे इस प्रथ्वी के आसमान में कोई उल्का आदि चमके । बिजली कौंधे । तो सभी निवासियों को ज्ञात हो जाता है । ऐसे ही जब भी कोई भक्ति पुंज प्रकाशित होता है । तुरन्त उसकी खबर अधिकांश को हो जाती है । अक्सर वर्णनों में ऐसा आता है कि उसके तप से तीनों लोक जल उठे । उसके घनघोर तप से धरती आसमान थर्रा उठे, डोलने लगे आदि ।
तो देवता या अन्य कुछ शक्तियां, माया आदि जिनका कार्य भक्ति में बाधा डालना भी होता है । निश्चय ही जान जाते हैं । सर्वप्रथम तो माया ही जान जाती है । क्योंकि इच्छाशक्ति जगत के विपरीत भगति की ओर होने लगती है । इसके पश्चात तीन गुणों के नियंता, प्रतिनिधि बृह्मा विष्णु शंकर आदि जान जाते हैं । क्योंकि इनकी क्रियायें भी विपरीत हो उठती हैं । फ़िर भक्ति स्तर बढने पर काल और अन्य भी चौकन्ने हो उठते हैं । क्योंकि एक भक्त जीव जाग्रत होकर निकट भविष्य में उनके लिये चुनौती बनने वाला है । इनके लिये एक-एक जीव की बहुत कीमत होती है ।

वास्तव में यह अजीब सी बात है । परन्तु तत्व को समझकर जाग्रत होने की दशा में मुढ चुका निश्चयात्मक बुद्धि का जीव ( यदि वह पात्र भी हो ) यदि बिना भक्ति के विष्णु लोक या विष्णु पद भी मांगे । तो त्रिलोकी सत्ता बेहिचक सहर्ष दे देगी । क्योंकि इससे जीव उनकी जद में ही रहेगा । और अक्सर ऐसा ही हो जाता है ।

अब दूसरी बात यह कि - बृह्मा विष्णु शंकर आदि देवता उस भक्त जीव को हुये उपदेश के बारे में सैद्धांतिक जानकारी लेकर स्वयं भी प्रयास कर सकते हैं । तो मैं कह चुका हूँ । उनका तन्त्र और यन्त्र दोनों ही इस प्राप्ति के अनुरूप नहीं होते । क्योंकि मुख्यतया देवों के निर्माण में सिर्फ़ बृह्मांड ही होता है । पिंड नहीं होता । जबकि इस लक्ष्य के लिये एक ही काय में अंड पिंड बृह्मांड तीनों का होना आवश्यक है ।

बङे भाग, मानुष तन ? पावा । सुर दुर्लभ ? सद ग्रन्थन गावा ।
सुर दुर्लभ मानुष तन, यानी सर्व सुख भोगी देवों के पास यह मनुष्य शरीर नहीं है । जाहिर है कि आत्मतत्व ज्ञान के लिये मनुष्य शरीर अनिवार्य है ।

दूसरे जब देवों का देवत्व काल पूर्ण हो जाता है । तो इन्हें मेघों के साथ उस देवलोक से कुछ विशेष जीवों के आवरण में गिरा देते हैं । तदुपरान्त विभिन्न योनियों से गुजर कर जब कभी इन्हें मनुष्य शरीर मिलता भी है । तो अज्ञान को लेकर इनमें और इस धरती के मनुष्यों में कोई अन्तर नहीं होता । कृष्ण रुक्मणी को को सत्रह बार इन्द्र बन चुके चींटे के बारे में बताते हैं । हम धरती पर स्वयं सहित जिन असंख्य मनुष्य और जीवों को देखते हैं । वे सब और हम अनेकानेक बार देवता राक्षस भगवान यक्ष आदि सभी कुछ बन चुके हैं । यह त्रिलोकी तन्त्र के बारे में है । इससे परे की बात अलग हो जाती है । वहाँ की स्थितियां उपाधियां अमरत्व वाली होती हैं ।
अतः देवता यदि प्रयास करें भी तो कुछ नहीं होने वाला ।

7. सदगुरु कबीर का उपदेश व्यापक स्तर पर क्यों नहीं किया गया ? किसी भी ज्ञान, मंत्र को एकदम क्लियर नही बताया गया । यहाँ तक कि कई कबीर पंथी संत अलग अलग मंत्र उपदेश दे देते हैं । उन्हें भी नहीं पता होता । साधारण इंसान के लिए तो इसे कोई विशेष कृपा कैसे मानें ।

उत्तर - समस्त द्वैत अद्वैत अलौकिक ज्ञान गूढ की श्रेणी में आता है । हीरा पायो गांठ गठियाओ । हीरा वहाँ न खोलिये जहाँ कुंजङन की हाट । अतः मन्त्र गूढ शैली में ही लिखे गये हैं । साधारणतः जैसे विज्ञान गणित आदि जटिल विषय जन साधारण के लिये नहीं होते । कुछ ही लोग इनके अधिकारी हो पाते हैं । ऐसे ही आध्यात्म जैसे उच्च विषय विशेष मायनों में सभी के लिये नहीं होते । और जो पात्र होते हैं । उनके लिये गूढता सरल सहज हो जाती है ।

जहाँ तक व्यापक स्तर पर उपदेश की बात है । कोई भी उपदेश व्यापक स्तर पर नहीं होता । वर्गीय और वर्गीय भेद होने से ही सृष्टि विलक्षण बहुरंगी बहुरस वाली है । सत्य ज्ञान का उपदेश व्यापक स्तर पर होने से 90% सृष्टिक गतिविधियां मृत हो जायेंगी ।

सत्य ज्ञान गद्दी परम्परागत नहीं होता । और कबीर पंथ या अन्य इसी गद्दी परम्परा के अंतर्गत हैं । शेष कबीर पंथ या उनका ज्ञान क्या कैसे क्यों है । कबीर ग्रन्थ ‘अनुराग सागर’ से स्पष्ट हो जाता है ।

8. मैंने सुना है सदगुरु कबीर राम नाम का जप करते थे । क्या उनको इस जप की आवश्यकता थी ? और सदगुरु कबीर यदि विष्णु या कृष्ण से श्रेष्ठ हैं । तो उन्होने साधारण जन के सामने ज्ञान उपदेश क्यों नहीं किया । उन्हें तो कोई भय नहीं होगा । क्या परमात्मा यह नहीं चाहते कि सब उन्हें जानें । क्योंकि परमात्मा के सामने कालपुरुष की दाल तो नहीं गलेगी ।
धन्यवाद !

उत्तर - आपने गलत सुना है । कबीर कोई जाप नहीं करते थे । बल्कि उन्होंने जहाँ जहाँ ऐसी वाणी कही है । वह भक्त जीव के उस स्थिति का प्रतिनिधित्व किया है । दूसरे शब्दों में इसको वैज्ञानिक विश्लेषण कह सकते हैं । जैसे -

कबीर कूता राम का मुतिया मेरा नाम, गले राम की जेबरी जित खेंचो तित जावं ।

अर्थात समर्पित भक्त की स्थिति गले में रस्सी पङे उस कुत्ते की भांति है । जिसकी डोरी मालिक के हाथ है । और वह उसी की इच्छानुसार चलता है । कबीर का अर्थ मनुष्य शरीर का संचालक जो चेतन पुरुष है, होता है ।
तुलसीदास ने इसको ऐसे कहा है ।
उमा दारु जोषित की नाईं, सबहि नचावत राम गुसाईं ।
दारु जोषित - कठपुतली ।

निसंदेह विष्णु या कृष्ण और कबीर की तुलना में राजा भोज और गंगू तेली जैसा फ़र्क है । कबीर राजा हैं ।

कबीर के सभी जाति धर्म देश में दीक्षित अदीक्षित 70 हजार शिष्य थे । जिनमें राजा रंक सभी थे । उन्होंने बेहद सरल सादगी युक्त जीवन के साथ हरेक को उपदेश किया । निर्भयता का ज्ञान देने वाले को भय कैसे हो सकता है ?
परमात्मा न यह चाहते कि कोई उन्हें जाने । न यह चाहते कि न जाने । इसके लिये आदिसृष्टि के बाद से ही एक कानून बना हुआ है । उसी ज्ञान विज्ञान से सभी घटनायें होती हैं ।
परमात्मा की सृष्टि में एक ही समय में अरबों कालपुरुष होते हैं । जो इससे ऊपर की कई उपाधियों के तुलनात्मक बेहद छोटी उपाधि है । अतः दाल गलेगी जैसा कुछ सोचना ही व्यर्थ है ।


Tuesday, November 19, 2019

November 19, 2019

हमारे जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य क्या है?

ज्ञानी संतों का मत है कि जीवन का उद्देश्य ' जन्म मृत्यु अर्थात् आवागमन से मुक्ति प्राप्त करना है’। भगवान बुद्ध ने जैसे बताया भी कि, इस संसार मे केवल दुख है और इस दुख से बचने के लिए निर्वाण प्राप्त करना होगा।

सनातन धर्म का यह विश्वास है कि हमारे जन्म हमारी ही इच्छा और कर्मों का परिणाम है। अर्थात हमारा जीवन हमे अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही मिला है। क्योंकि अगर हमारी किसी सुख या दुख को भोगने की इच्छा नही होती तो हमारा जन्म ही नही होता।

लेकिन समस्या यह है कि हमारी इच्छा बढ़ती जा रही है, हम हर जन्म मे और इच्छायें जोड़ते जा रहे हैं। इनमे बहुत सी इच्छायें हमारी नहीं पूरी होती हैं। जैसे आप किसी व्यक्ति से प्यार करते हैं और शादी करने चाहते हैं , परंतु आपके कर्म, सामने वाले की इच्छा और प्रारब्ध इस जन्म मे शादी के लिए सहयोग नही करते और आपकी शादी नही हो पाती। लेकिन यह बात यहाँ समाप्त नही होती। प्रकृति आपकी इच्छा को रख लेती और उस इच्छा को पूरा करने के लिए एक प्लान बनाती है। इस प्लान मे आपकी इच्छा को पूरा करने के लिए इस जन्म से लेकर कई जन्म हो सकते हैं। इस तरह आपके जन्म होते रहते हैं।

दूसरी समस्या हैं आपके कर्म, आप अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अच्छे बुरे कर्म करते रहते हैं। अच्छा और बुरा कर्म पाप पुण्य को उत्पन्न करते हैं। इन पाप पुण्य के परिणाम स्वरूप सुखर दुख मिलते हैं। जिन्हे आपको भोगना होता है। ये भी आपको मृत्युलोक मे ऊलझाए रखते हैं।

तीसरी समस्या है आपका लगाव, हर जन्म मे आपके कुछ रिश्ते बन जाते हैं। आपका उनसे लगाव हो जाता है। अब आपकी इच्छा उस शरीर से पूरी न हो तब भी आप उस शरीर को नहीं छोंडना चाहते। प्रकृति आपको दंड देती है और आपका शरीर छीन लेती है। आप फिर अपने लगाव के वजह से उन्ही रिश्तेदारों के बीच जन्म लेते हैं। जैसे आप राजा भोज को जानते ही होंगे, उन्होंने ही भोपाल शहर बसाया था। राजा भोज की माता उनको जन्म देकर मृत्यु को प्राप्त हो गई। वही माता फिरसे जन्म लेकर अंगले जन्म मे राजा भोज की पत्नी बनी।

अब प्रश्न आता है ये कब तक चलेगा और कब आप इस प्रोसेस से ऊब जायेंगे। या कब आपको ऐसा ज्ञान प्राप्त होगा की संसार रूपी मेला मे बहुत घूम लिया और अब हमे वापस अपने घर जाना चाहिए, जहाँ से हम आये हैं। हम सब एलिएन ही हैं और ये संसार हमारा नही था। हम इस संसार मे आये और फंस गए। और जब आप फंस गए तो आपको फिरसे याद दिलाने के लिये कुछ संत या भगवान आदि भी इस संसार मे उतरे। आप उनके शरण मे जाइए और उद्धार पाइए। इस प्रक्रिया मे भी बहुत से जन्म हो जाते हैं।

द्वारा
लवलेश गौतम
November 19, 2019

हिन्दू पुराणों के अनुसार पृथ्वी पर सर्वश्रेष्ठ योद्धा कौन था?

हिंदू पुराणो के अनुसार सबसे बेहतरीन योद्धाओं मे अनेक योद्धाओं का नाम आता है। जैसे भगवान राम के पूर्वज जिन्होंने सात द्वीपों का निर्माण करके पूरे विश्व मे राज किया। राजा सगर, जिन्होंने समुद्र का निर्माण किया। राजा रघु, जिन्होंने एक तिनके के बाण से रावण को समुद्र के पार फेंक दिया।

 भगवान राम के पुत्र लव और कुश, जिन्होेंने भगवान राम की सेना को हरा दिया। अधर्मी क्षत्रियों का संहार करने वाले भगवान परशु राम, जिन्होंने सहस्त्र बाहू और उसकी सेना का संहार किया। महाभारत के भीष्म, जिन्होंने अपने गुरु परशु राम को पराजित करने का कीर्तिमान स्थापित किया।

महाभारत का अर्जुन, जिसने महाभारत युद्ध के पहले ही कीरात/विराट के युद्ध मे अकेले ही पूरी कौरव सेना सहित कर्ण, अश्वत्थामा, द्रोंण् और भीष्म पितामह को पराजित किया। हनुमानजी भी सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं मे एक हैं। कलियुग मे भी शानदार योद्धा हुए, जैसे सम्राट विक्रमादित्य जिन्होंने सारी धरती जीत कर अपने भाई को राज करने को दिया। राजा भोज जो मक्का तक म्लेछों को पराजित किया। महाराज पुष्यमित्र जिन्होंने अशोक के मौर्य वंश को समाप्त किया और बौद्धों से हिंदू धर्म की रक्षा की। महाराज शालिवाहन जिन्होंने म्लेछों को भारत से समाप्त किया।

लेकिन जब पुराण के अनुसार सर्व श्रेष्ठ योद्धा की बात आती है तो भगवान के अवतार ही प्रमुख हैं। भगवान कृष्ण लक्ष्मणा के साथ विवाह के समय लक्ष्मणा के पिता ने अपनी पुत्री के विवाह उसी वीर से करने का निश्चय किया, जो की पानी में मछली की परछाई देखकर मछली पर निशाना लगा सके। शिशुपाल, कर्ण, दुर्योधन, अर्जुन कोई भी इस लक्ष्य का भेद न कर सका। तब भगवान कृष्ण ने केवल परछाई देखकर मछली पर निशाना लगाकर स्वयंवर में विजयी हुए और लक्ष्मणा के साथ विवाह किया।

 महाभारत काल मे ही बाणासुर, भगवान शंकर और कार्तिकेय को भगवान कृष्ण ने युद्ध मे हरा दिया। निसंदेह भगवान कृष्ण से श्रेष्ठ योद्धा कोई नही है। एक बात और बताना उचित होगा कि विभूति योग मे भगवान कृष्ण ने अर्जुन से बताया कि, “ शस्त्र धारियों मे भगवान राम सर्व श्रेष्ठ है”। भगवान राम के पास जो अस्त्र शस्त्र थे, उनमे से अनेकों अस्त्र शस्त्र किसी काल मे किसी योद्धा के आसपास नही थे। भगवान राम और रावण के बीच मे हुए युद्ध मे रावण द्वारा प्रयोग किए गए अस्त्र शस्त्र,तकनीकि और भगवान राम द्वारा उन्हें काटना अद्भुद है, जिन्हे साधारण मनुष्य ना तो वर्णन कर पाते हैं और ना ही समझ पाते हैं। इसलिए जब योद्धाओं की बात करें तो भगवान राम/कृष्ण के समान कोई योद्धा नही हैं और ना हो सकते हैं। यहाँ आदि शक्ति दुर्गा माता के बारे मे नही कहा गया, क्योंकि हम उन्हे शामिल कर रहे हैं, जो मनुष्य जीवन जिये हैं।

द्वारा
लवलेश गौतम
November 19, 2019

ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी की जन्म-मृत्यु होती है? अगर होती है तो इसका प्रमाण कहां पर है?

बहुत ही अच्छा प्रश्न है। लेकिन इस प्रश्न के उत्तर अलग अलग शास्त्रों को पढ़ कर बने ज्ञानी अलग अलग देंगे। आप भ्रमित हो जायेंगे की सत्य क्या है। साधारणतः जन्म मृत्यु को प्राप्त होने वाले मनुष्य भगवान को भी अपने जैसा जन्मने और मरने वाला समझ लेते हैं। इससे बड़ा भ्रम क्या हो सकता है।

जन्म मृत्यु उसकी होती है, जो समय से बंधा है और उसके co ordinates मे यात्रा कर रहा है। भगवान समय के स्वामी हैं, उन्होंने इसे वैसे ही बनाया है जैसे वैज्ञानिक एक रोबोट मशीन बनाकर उससेे काम लेते हैं। समय, भगवान का एक स्वामी भक्त गुलाम है। इसलिए समय मे भगवान को समाप्त करने की शक्ति नहीं होती है। भगवान को महाकाल, महाकालेश्वर ऐसे ही नहीं कहा जाता। भले ही आपको कहीं पढ़ने या सुनने को मिले की भगवान की जन्म मृत्यु होती है तो आपको विश्वास नहीं करना चाहिए।

हाँ लेकिन आपको भगवान वेद व्यास स्वयं ही सामने आकर कहें तो आप विश्वास कर सकते हैं, क्योंकि वो भी समय से अपने को मुक्त कर चुके हैं, इसलिए वो किसी के सामने आकर किसी को भी ज्ञान देने मे समर्थ हैं।

द्वारा
लवलेश गौतम

November 19, 2019

क्या किसी का स्वभाव बदला जा सकता है?

स्वभाव किसी भी जीव को ईश्वर प्रदत्त है। जैसे बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना, सर्प का स्वभाव है डसना, शेर का स्वभाव है हिंसा, संतों का स्वभाव है दया। किसी जीव में जन्म के साथ ही ये गुण आता है और धीरे धीरे परिपक्व होता जाता है।

 जैसे कालिया मर्दन लीला में कालिया नाग भगवान कृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहता भी है कि मुझे आपने ही ऐसा बनाया है और आपने ही ऐसा स्वभाव दिया है, जिसके चलते मैं विष उगलता हूँ और हिंसा भी करता हूँ। आपके दिए इस स्वभाव के कारण ही मैं क्रोधी हूँ और बदला लेने में विश्वास करता हूँ। अपने इसी स्वभाव के चलते ही मैंने आप पर हमला किया।

इसलिए इसको बदलना एक तरह से नामुमकिन ही माना जाता है। इसीलिए मनुष्य को छोंडकर दूसरे जीवों को उनके कर्मों का पाप नहीं लगता है। जैसे एक सर्प आपको डस ले और आपकी मृत्यु हो जाए तो सर्प को पाप नहीं लगेगा। परंतु यदि आप उस सर्प को मार दें तो पाप लगता है। ऐसा इस्लिए होता है कि मनुष्य को भगवान ने दूसरे जीवों से श्रेष्ठ बनाया है। मनुष्य अपने विवेक के द्वारा ' क्या उचित है और क्या अनुचित है’ का निर्णय ले सकता है।

राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञ: पापं पुरोहित:।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं पुत्रम् पापं पिता तथा॥

स्वभावो न उपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा।
कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥

अन्यक्षेत्रे कृतं पापं पुण्य क्षेत्रे विनश्यति।
शस्त्र क्षेत्रे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति॥

वास्तव में मनुष्य भी अपने जन्म के साथ ही अपना स्वभाव लाता है। ये स्वभाव प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न होता है, सत, रज्, तम। जिस व्यक्ति मे तम गुण अधिक होता है, वो इर्ष्यालु, गुस्सैल और अपराधी प्रवृत्ति का होता जाता है। रज गुण वाला सुख की ही इच्छा करता है और कामी होता है। सत गुण उत्तम गुण है, ऐसा व्यक्ति प्रत्येक स्थिति में धैर्यवान बना रहता है। सतगुणी व्यक्ति किसी भी निर्णय में अपने विवेक को बेहतर इस्तेमाल करता है। जैसे सुरों मे रजोगुण होता है और असुरों में तमोगुण होता है। भगवान राम का अवतार सतगुण का उदाहरण हैं। किसी भी व्यक्ति का स्वभाव बदलना कितना मुश्किल है, ये आप इन उदाहरणों से देख सकते हैं:

१. रावण को हनुमान, विभीषण, मंदोदरी, अंगद और अनेक ऋषियों ने समझाने की कोशिश की, कोई परिणाम नहीं निकला।

२. दुर्योधन को भीष्म, विदुर, कृपाचार्य सहित भगवान कृष्ण ने कितना कोशिश की, उसका स्वभाव नहीं बदला।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि स्वभाव बदलना बिल्कुल असंभव है। लुटेरा अंगुलीमाल कितना बड़ा हत्यारा था, लेकिन भगवान बुद्ध के शरण में जाकर बिल्कुल ही बदल गया।

द्वारा
लवलेश गौतम

Tuesday, December 5, 2017

December 05, 2017

Different types of 'Sin'...

संसार मे मुख्य रूप से तीन प्रकार के पाप माने गये हैं:

1. बिना दिये हुए किसी की वस्तु ले लेना, हिंसा करना और अपनी धर्म पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी के साथ संबन्ध बनाना। ये तीन प्रकार के शारीरिक पाप माने गये हैं।

2. कडवे वचन बोलकर धर्म में लगे व्यक्ति, परिवार, दोस्त या धर्म पत्नी के हृदय को कष्ट पहुँचाना, चुगली करना, अनाप- शनाप बातें करना ये चार प्रकार के वाचिक पाप माने गये हैं।

3. अपनी कमाई को छोंडकर दूसरे के धन को पाने की लालच करना, मन से धर्मी व्यक्ति, परिवार, दोस्त या पत्नी के अनिष्ट के बारे मे सोचना, दूसरों को मारने को सोचना या अपने मरने से डरना ये तीन प्रकार के मान्सिक पाप माने गये हैं।

ये तीनो प्रकार के शारीरिक, मान्सिक और वाचिक पापों मे से किसी एक भी पाप से व्यक्ति का संबन्ध अगर जुडा हो तो उस व्यक्ति के द्वारा किये यज्ञ और पूजा-पाठ का तब तक कोई फल नही मिलता जब तक वो इन पाप कर्मों पूरी तरह से त्याग न दे। यदि कोई व्यक्ति इन तीनो प्रकार के पापों मे जुडा है और नही छोंडना चाहता तो उसे असुर ही मानना चाहिये।

यदि पाप कर्मो को व्यक्ति छोंड दे तो प्रायश्चित कर्मों के द्वारा मान्सिक पाप 28 दिन में, वाचिक पाप 12 महीने मे और शारीरिक पाप 12 साल में दूर होता है।

इसके अतिरिक्त ब्राह्मणों और संतो के प्रति दोष दृष्टि रखने और अधर्म कर्म मे लगे व्यक्ति को विष्णु पूजा का फल नही मिलता।

अगर कोई व्यक्ति अपनी धर्म पत्नी के प्रति दोष दृष्टि रखता है और उसे कष्ट देता है तो उसे लक्ष्मी पूजा का कोई फल नही मिलता।

कोई व्यक्ति स्त्रियों के प्रति दोष दृष्टि रखता है और अपनी धर्म पत्नी को प्रताडित करता हो तो ऐसे व्यक्ति के लिए दुर्गा अराधना उसके लिये काल बन जाती है। विनाश काले विपरीत बुद्धि के प्रभाव से पत्नी को घोर कष्ट देने वाले लोग दुर्गा अराधना में ही चले जाते हैं। जालन्धर अपनी पत्नी को घोर कष्ट देता था।जब उसने शक्ति की अराधना की भगवान शिव ने उसका नाश कर दिया। शिव और शक्ति दोनो मिलकर अर्धनारीश्वर बनते हैं। अपनी धर्म पत्नी को कष्ट देने का अर्थ ही अपने आधे शरीर की क्षति करना। मेरा मत है का दुर्गा अराधना करने वाले व्यक्ति किसी स्त्री को अपने पैर भी न छूने दे।रामकृष्ण परमहंस ने बहुत सी सिद्धियाँ अपनी पत्नी की पूजा करने से पा ली थी। तुम्हारी पत्नी ही लक्ष्मी और गौरी का रूप हैं और तुम्हारी बेटियाँ ही दुर्गा हैं।
मृत्यु और दुख से जो डरे रहते हैं उन्हे भगवान शिव की पूजा का कोई फल नही मिलता।

उत्तम कर्म करने से मन और आत्मा पवित्रता का अनुभव करते हैं, उनका ही संबन्ध भगवान से जुड सकता है।

द्वारा
लवलेश गौतम