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Wednesday, April 22, 2020

April 22, 2020

क्या स्त्रियों की दयनीय दशा के लिए पुरुष जिम्मेदार है?

क्या स्त्रियों की दयनीय दशा के लिए पुरुष जिम्मेदार है? 




समाज "पुरुष प्रधान" बना इसके लिये कौन जिम्मेदार है?

उत्तर: आदि काल से स्त्रियों ने उन्ही पुरुषों को चुना है, जिन्हे वो खुद से विशेष समझती हैं। जैसे सतयुग ज्ञान प्रधान था, उस समय की स्त्रियाँ भी ज्ञान के पींछे भागती थी। इस वजह से उस समय के चक्रवर्ती राजाओं की क्षत्राणी पुत्रियाँ भी ब्राह्मण और ऋषियों के सामने समर्पण करके उनसे विवाह करके उन्ही के आश्रमो मे रहने लगती।

 जैसे अनुुसुइया, अहिल्या आदि सभी राजकन्याओं ने ऋषियों से विवाह किया। इन सबकी देवियों के रूप मे पूजी जाती हैं। इसके बाद उनकी धारणायें बदलती गयी। लेकिन महत्वपूर्ण ये है कि उन्होने अपने अनुरूप उन्ही पुरुषों के सामने समर्पण किया जो उन्हे खुद से विशेष लगता और जिसे वो अपनी इच्छाओं के पूरा करने मे सहाँयक समझती। सृष्टि के आदि मे भी जब देवी दुर्गा ने तीन देवियों को प्रकट किया और कहा तुम अपनी इच्छा से तीनो देवों मे किसी एक से विवाह कर लो। ब्रह्मज्ञानी ब्रह्मा को ज्ञान की आवश्यकता नही है फिर भी देवी सरस्वती ने उनसे विवाह किया। शंकर जी सर्वशक्तिमान विनाशक हैं तो देवी पार्वती ने उनके समर्पण कर दिया। समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी के सामने अनेकों देवताओं ने विवाह की इच्छा की परंतु लक्ष्मी ने भगवान विष्णु के सामने समर्पण किया। यहाँ पर भगवान विष्णु बिल्कुल उदासीन थे। उन्हे नाम मात्र को भी ऐसा कुछ नही लगा कि लक्ष्मी मे कोई विशेषता है। सभी युगों में यही हुआ।


 जब उन्हें विवाह के लिए पुरुष चुनने को अधिकार मिला उन्होंने उसी को चुना जो उनसे विशेष था और जो उन्हें पसंद था। आज भी पढ़ा लिखा अच्छे पद प्रतिष्ठा वाला पुरुष किसी साधारण घर की अनपढ लड़की से विवाह कर लेते हैं। परंतु लड़कियों को उनसे ज्यादा पढ़ा- लिखा, उनसे बड़े पद वाला लड़का चाहिए। ऐसे ही सभी स्त्रियाँ अपनी नजर मे विशेष पुरुष के सामने समर्पण करके उनसे विवाह किया। इस प्रकार आदिकाल से स्त्रियों ने उन पुरुषों से विवाह किया जिनसे वो पराजित हो गयी। स्त्रियों ने उन पुरुषों से विवाह नही किया जो उनसे पराजित थे। अर्थात् जो पुरुष उन्हे विशेष समझते थे और उनके सौन्दर्य, प्रेम, ज्ञान आदि से आकर्षित होकर उनके सामने समर्पण कर देते थे। उन पुरुषों को वो महत्व नही देती और उनकी भावनाओं का स्त्रियों के सामने कोई महत्व नही रहा।


 इस प्रकार समाज 'पुरुष प्रधान' होता गया क्यूँकि विशेष स्त्रियाँ अपने से विशेष पुरुषों के सामने पराजित होकर उनसे विवाह करती गयी। अगर स्त्रियाँ अपने से पराजित पुरुषों को महत्व देकर उनसे विवाह करती तो समाज "स्त्री प्रधान" हो जाता है। आज अगर समाज मे स्त्रियों की दशा ऊपर उठी है तो उसकी वजह यही है कि 2 से 4 प्रतिशत स्त्रियाँ उनसे विवाह कर रही हैं जो उनसे पराजित हो गये हैं और वो उनसे पराजित नही है। सूरज के सामने चाँद का अस्तित्व क्षीण हो जाता है। अगर स्त्रियाँ खुद को चाँद समझकर अधिक प्रकाश वाले सूरज को चुनेंगी तो समाज "पुरुष प्रधान" ही रहेगा। इंदिरा गाँधीजी ने फ़िरोज़ खान से विवाह किया तो क्या इंदिरा के पद प्रतिष्ठा मे फर्क पड़ा? क्या फ़िरोज़ खान पुरुष प्रधान बना पाए? अगर पुरुष प्रधान समाज़ न बने और स्त्री प्रधान समाज बन जाए तो स्त्रियाँ अपने से कम पढ़े लिखे, अपने से कम पद प्रतिष्ठा वाले, अपने उपर मर मिटने वाले लड़कों से विवाह करें।

इस आर्टिकल का उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं है। परंतु अगर आप पढ़कर इस पर ध्यान देंगे तो इसक सत्यता को पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता।

द्वारा
लवलेश गौतम

Tuesday, November 19, 2019

November 19, 2019

पुरूष के कौन से गुण महिलाओं को पसंद हैं?

पुरुषों के कुछ विशेष गुण जो महिलाएँ पसंद करती हैं:

१. महिलाओं का सम्मान करता हो।

२. महिलाओं को समाज मे बराबर का दर्जा देता हो।

३. महिलाओं को हीन दृष्टि से ना देखता हो।

४. महिलाओं के निर्णयों का भी आदर करता हो।

५. महिलाओं की आजादी का हनन न करे, उन्हे भी उनके निर्णय लेने मे सहयोग करता हो।

६. साहसी हो, परंतु बदतमीज न हो।

७. प्रेम करने का गुण होना चाहिए।

८. अहंकार को प्रदर्शित करने वाला गुण उसमे नही होना चाहिए।

९. रिश्तों के प्रति ईमानदार हो और अपने उत्तरदायित्यों को भली भाँति समझता हो और अपने कर्तव्य पालन के प्रति जागरूक हो।

द्वारा
लवलेश गौतम
November 19, 2019

सच्चा प्यार क्या होता है?

प्यार एक् बेहद शानदार भावना है। हमे पता भी नही चलता और हम प्यार मे जी रहे होते हैं। प्यार अपने मे एक बहुत बड़ी शक्ति है जो बड़े से बड़ा बदलाव करने मे समर्थ है। प्यार ही वह धागा है जिसने पूरी दुनिया को जोड़े रखा है। जब हम किसी की फिक्र करते हैं और उसका भला चाहते हैं तो ये प्रेम ही तो है।

जब प्यार मोह मे परिणित हो जाता है तो परिणाम भयंकर हो जाता है। जैसे धृतराष्ट्र अपने पुत्रों से मोह करता था तो उसका परिणाम महाभारत युद्ध हुआ।

मान लो किसी बगीचे के पेंड मे एक तोता रहता है। आपको उस तोता से प्यार हो गया। आप उस तोते के लिए कभी फल ले जाते हैं तो कभी खाना। यही सच्चा प्यार है। लेकिन आप उस तोते को अपने साथ रखने की जिद्द करने लगे और उसको अपने साथ लाकर पिंजरे मे कैद करके रख ले और उसकी आजादी छींन ले तो यह मोह है।

प्यार निस्वार्थ होता है। यह एकतरफा भी हो सकता है और दो तरफ़ा भी। यह किसी का किसी से भी हो सकता है। प्यार इंसान से भी होता है और जानवर से भी। भगवान से प्रेम होना तो उत्तम है।

“ इश्क़ में सिर्क और मोहब्बत में बेवफाई की जगह नहीं होती
और उस मोहब्बत का क्या कहना, जिसमें आपको रोजा रखना पड़ जाये।"

द्वारा
लवलेश गौतम
November 19, 2019

मेरी सबसे पसन्दीदा कहानी कौन सी है?

मेरी पसंदीदा हिंदी कहानियों मे सबसे पसंदीदा कहानी है, चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी की ' उसने कहा था’।

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की लाजवाब कहानी ‘उसने कहा था’ न केवल प्रेम-कथाओं, बल्कि हिंदी की 10 उम्दा कहानियों में शुमार है। साहित्य जगह के नामी आलोचक नामवर सिंह की मानें तो गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' का समुचित मूल्यांकन होना अभी बाकी है। अभी इसे और समझे और पढ़े जाने की जरूरत है।

शीर्षक सीधे-सीधे पाठकों को खींचता है और उनसे पुकारकर कहता है कि पढ़ो, किसने कहा था? किससे कहा था? क्यों कहा था? क्या कहा था?

पढेंगे तभी तो पता चलेगा कि सूबेदारनी ने लहना सिंह से कहा था कि मेरे पति और बेटे की रक्षा करना और जो उसने अपनी जान की बाजी लगाकर की भी. अब सवाल उठता है कि कोई किसी से कुछ ऐसे ही तो नहीं कह देता. बिना किसी भरोसे के, रिश्ते और संबंध के ऐसी बात कहां होती है भला? न सामनेवाला इतनी आसानी से मान लेता है. संबंध है तो बस इतना कि 23 बरस पहले वे अमृतसर के बाजारों में कहीं मिले थे. लड़के ने खुद तांगे के पहिए के नीचे होकर भी लड़की की जान बचाई थी. लड़का, लड़की से रोज पूछता था, ‘तेरी कुड़माई हो गई? लड़की रोज शर्माती थी पर एक दिन उसने कह दिया था हो गई.

‘उसने कहा था’ प्रथम विश्वयुद्ध के तुरंत बाद लिखी गई थी. तुरंत घटे को कहानी में लाना उसके यथार्थ को इतनी जल्दी और इतनी बारीकी से पकड़ पाना आसान नहीं होता पर गुलेरी जी ने यह किया और खूब किया.

और तब उसने एक लड़के को मोरी में धकेल दिया था, एक कुत्ते को पत्थर मारा और एक वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि भी पाई थी. 12 साल के उस बच्चे की मनःस्थिति के बाद कहानी बीच के अंतराल को खाली छोड़ते हुए सीधे 25 साल आगे आती है. यह बिन बताए कि फिर क्या हुआ था. यहां चाहें तो आप कहानी में अपनी कल्पना से रंग भर लें, उन कुछ सूत्रों के आधार पर जो कहानी में यहां-वहां बिखरे हुए हैं.

वहां से यह कहानी युद्ध के मैदान तक एक लंबी छलांग लगाती है. यह समयांतर कहानी के फलक को काफी बड़ा बना देता है जो इस कहानी और लेखक को अमर बनाने वाला एक और तत्व है. युद्ध और प्रेम इस कहानी के दो कोण है या दो सिरे. यहां कहानी अमृतसर की गलियों की उस घटना के बाद सीधे प्रथम विश्वयुद्ध के मोर्चे पर पहुंचती है. वहां के भारतीय सैनिकों, उनकी चुहलबाजियों, अपने वतन की याद और स्मृतियों के बीच. पांच खण्डों में और 25 वर्षों के लंबे अंतराल को खुद में समेटती यह कहानी विषय और अपने अद्भुत वर्णन में किसी उपन्यास की सी है. प्रेम, कर्तव्य और देशप्रेम के तीन मूल उद्देश्यों से जुड़ती, उसे अपना विषय बनाती हुई. कहीं भी अपने विषय से न भटकते हुए, न इधर-उधर होते हुए. शाब्दिक विवरणों से ज्यादा मनोविज्ञान को पढ़ते, पकड़ने और उसके चित्रण में रमती हुई. सोचकर देखें तो प्रेम, कर्तव्य और देशप्रेम एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू हैं और सबके मूल में प्रेम ही है. कर्तव्य भी तो प्रेम का ही एक रूप होता है और देशप्रेम भी तो बड़े और वृहद् अर्थों में प्रेम है इसलिए यह कहानी हर अर्थ में प्रेम कहानी है.

मेरी दूसरी पसंदीदा हिंदी कहानी है, जयशंकर प्रसाद की कहानी -'पुरस्कार'। यह कहानी एक आदर्श महिला ' मधुलिका' की कहानी है, जो देश प्रेम और व्यक्ति प्रेम के मध्य संघर्ष मे अपना आदर्श प्रस्तुत करती है।।
पुरुस्कार कहानी हिंदी के प्रसिद्ध लेखक ‘जयशंकर प्रसाद’ द्वारा लिखित कहानी है।

कहानी की मुख्य पात्र एक तरुण आयु की कन्या ‘मधुलिका’ है। जो कोशल राज्य के ही एक वीर सैनिक सिहंमित्र की पुत्री है। सिंहमित्र ने पूर्व समय में अपनी वीरता से कोशल राज्य के सम्मान की रक्षा की थी।

कहानी का आरंभ उस दृश्य के साथ होता है जब कोशल नरेश राज्य की परंपरा के निर्वाह के लिये हर वर्ष इन्द्र की पूजा होती थी। ये एक कृषि उत्सव था जिसमें राजा अपने राज्य के किसी किसान की भूमि का अधिग्रहण कर उसमें एक दिन का कृषि कार्य करता  और उत्सव के अन्य आयोजन संपन्न करता था। इस बार मधूलिका का खेत राजा ने अधिग्रहण किया था। राजा पुरुस्कार स्वरूप मधुलिका बहुत बड़ी धनराशि देनी चाही वो पर वो पुरुस्कार लेने से मना कर देती है, और कहती है कि वो अपने खेत का सौदा नही करेगी। राजा के कहने पर और अन्य लोगों के समझाने पर भी वो नही मानती। इस उत्सव में आसपास से राज्यों से भी राजा-राजकुमार आदि अतिथि रूप में आते थे। मगध का राजकुमार अरुण भी वहाँ आया हुआ था और वो ये घटना देख रहा था।

उत्सव संपन्न हो जाता है, मधुलिका पुरुस्कार नही लेती है, राजकुमार अरुण ये मधुलिका से प्रभावित होता है। वो रात में मधुलिका की कुटिया में उससे मिलने आता है, उससे प्रणय निवेदन करता है। वो कहता है कि वो उसकी सहचरी बन जाये। वो कोशल नरेश से कहकर उसका खेत वापस दिलवा देगा। पर मधुलिका उसके आग्रह को ठुकरा देती है, वो वापस लौट जाता है।

मधुलिका फिर अपने खेत नही जाती और दूसरे खेतों में काम करके किसी तरह अपना जीवन-यापन करती है। यूं ही तीन वर्ष बीत जाते हैं। अब मधुलिका अपनी आर्थिक विपन्नता से व्यथित हो चुकी है, उसे राजकुमार अरुण की भी याद आती है। एक रात संयोग से राजकुमार स्वयं उसकी कुटिया में शरणार्थी के रूप में आ जाता है। वो बताता है कि उसने अपने राज्य में विद्रोह कर दिया है और अपने राज्य से निष्काषित कर दिया गया है। मधुलिका भी उससे प्रेम कर बैठती है और उसकी बातों में आ जाती है। अरुण मधुलिका को इस बात के लिये राजी कर लेता है कि वो कोशल नरेश से अपने खेत के बदले में किले के पास वाली भूमि मांग ले। चूंकि वो भूमि किले के पास है अतः वहाँ से अरुण अपने साथी सैनिकों के साथ किले पर आसानी से हमला कर सकता है। वो मधुलिका को लोभ देता है कि वो कोशल पर कब्जा कर अपना शासन स्थापित कर लेगा और उसे अपनी रानी बनायेगा। मधुलिका भी प्रेम में थी इसलिये उसे भी रानी बनने का लोभ हो जाता है। वो कोशल नरेश के पास जाकर किले के नाले के पास वाली भूमि मांग लेती है। अरुण भूमि पाकर खुश होता है वो कोशल पर छुपकर आक्रमण करने की तैयारी करने लगता है।

पर मधूलिका का मन अशांत है वो सोचती है कि वो क्या करने जा रही है। कहाँ उसने अपनी ईमानदारी और सम्मान की खातिर अपने खेत के बदले राजा से पुरुस्कार तक नही लिया, और अब वो राज्य के एक शत्रु को पनाह देने के लिए राजा की दी भूमि का उपयोग कर रही है। उसके पिता ने राज्य की रक्षा के लिये अपने प्राण दे दिये और वो राज्य के साथ विश्वासघात कर रही है। उसकी अन्तरात्मा उसे धिक्कारती है और वो राजा को सारी बाते बता देती है कि पड़ोसी राज्य मगध का विद्रोही राजकुमार अरुण कोशल पर आ्क्रमण करने की योजना बना रहा है। राजा शीघ्र ही अरुण को पकड़ लेता है। उसे मृत्युदंड दिया जाता है। राजा मधुलिका की प्रशंसा करते हुये उसे पुरुस्कार मांगने को कहता है तो मधुलिका स्वयं के लिये भी मृत्युदंड का मांग करते हुये अरुण के पास खड़ी हो जाती है।

इन दोनो ही कहानियों को अधिकतर पढ़े लिखे व्यक्ति पढ़ चुके होंगे, परंतु जिन्होंने नही पढ़ी या जिन्हे याद नही है उन्हे अवश्य पढ़नी चाहिए। इन्हे पढ़ने के बाद इन कहानियों की गहराई का पता चलता है।

द्वारा
लवलेश गौतम
November 19, 2019

मिर्ज़ा गालिब की सबसे बेहतरीन शायरी कौन सी है?

ग़ालिब साहब का हर शेर लाजवाब है।
मेरा पसंदीदा शेर है:

“मैं बुलाता तो हूँ उसको मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उस पे बन जाये कुछ ऐसी कि बिन आये न बने”.

I do call her, but oh! the passion of heart. May something comes over her like that, that she can not endure not coming. The poet says I do call her to give me company but all I get is a disappointment and her indifference. If only somehow something could happen to her that she could not resist coming to me! The poet in his solitude and misery personifies the only thing he knows will give him company and a patient ear while he waits for his lover which he knows will not come. you my torrid heart, my only friend!

“इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने”

There is no control over love, this is that fire, Ghalib!. That having been lit, still does not burn and having been extinguished, it still does not go out. These are the most well known lines from this ghazal, no guess why!. The poet says love is a like a fire over which no one has any control. It is not in anyone's power to lit the flames of passion in someone's heart despite trying nor is it possible to extinguish the flames of passion from someone's heart despite trying. Fairly straightforward lines!!

keh sake kaun ki yeh jalwaa_garee kiskee hai
parda choda hai woh usne ki uthaaye na bane

“कह सके कौंन कि ये जलवागरी किसकी है
पर्दा छोंडा है वो उसने कि उठाये ना बने”

Who can say that whose is this splendour doing (act of). That one has lowered the veil that it is not able to be lifted. These are the best lines from the ghazal. Simple words yet many possible and contemplative themes. The poet says, who can tell whose acts of splendour this is? Whose brilliant manifestation this is? That manifested one, has lowered the veil/curtain that can not be lifted even if tried. Who can says whose demonstration or brilliant presentation this is? We do not know whose and we do not know who can tell us about that whom? That demonstration is yet another question (what has been displayed so brilliantly?). To all these questions, the second lines answers none and instead adds more questions. Who dropped the curtain? Maybe the splendour itself casts a veil on us by its brilliance or is it the doer that intentionally drops the veil. Referring to the Divine Beloved, the poet questions who can tell whose magnificence is this? The One has left behind this veil (the magnificence being mentioned is the world and its workings around us) that does not allow us to lift it up and see the True nature of the Divine. The veil has been intentionally left down so that we are unable to see that. In alternative reading the veil being inability of us (with no help from anyone in dropping the veil) to grasp the Divine and lift the veil of falsehood and mortality. As said earlier, it is a fairly obtuse lines and open to any line of thought!

द्वारा
लवलेश गौतम

Wednesday, December 6, 2017

December 06, 2017

Debate between two babies(twins) in Mother's womb:


मान लो किसी वैज्ञानिक लडकी(PHD in Physics) की किसी धार्मिक और आस्तिक लडके(PHD in Spiritual Science/Vaidic litrature) से विवाह हो जाये वैसे ही जैसे विश्वरूपम मूवी मे वैज्ञानिक बनी ऐक्ट्रेस पूजा कुमार की कमल हसन से हो जाती है। अब जब ये दोनो मिलकर चाइल्ड कन्सीव करते हैं तो इत्तेफाक से जुडवा बच्चे वैज्ञानिक माँ के पेट मे आ जाते हैं। जुडवां बच्चो मे एक अपनी मम्मी पर और एक अपने पापा पर जाता है। वैज्ञानिक मम्मी के पेट के अंदर चल रही इन दोनो जुडवा बच्चों की बहस आज आपको पढाते हैं:

Science believer baby - Do you believe in life after delivery ?

Spiritualy inclined baby - Why, of course. There has to be something after delivery. Maybe we are here to prepare ourselves for what we will be later.

- Nonsense. said the science believer baby - There is no life after delivery. What kind of life would that be ?

The Spiritualy inclined baby said - I don’t know, but there will be more light than here. May be we will walk with our legs and eat from our mouths. May be we will have other senses that we can’t understand now.

The Science believer baby replied - That is absurd. Walking is impossible. And eating with our mouths ? Ridiculous ! The umbilical cord supplies nutrition and everything we need. But the umbilical cord is so short. Life after delivery is to be logically excluded.

The spiriually inclined baby insisted - Well I think there is something and may be it’s different than it is here. Maybe we won’t need this physical cord anymore.

The Science believer baby repied - Nonsense. And more over if there is life, then why has no one has ever come back from there ? Delivery is the end of life, and in the after-delivery there is nothing but darkness and silence and oblivion. it may be a black hole. It takes us no where.

- Well, I don’t know. said the second
- but certainly we will meet Mother and she will take care of us.

The science believer baby replied - Mother ? You actually believe in Mother ? That’s laughable. If Mother exists then where is She now ?

The spiriual baby said - She is all around us. We are surrounded by her. We are of Her. It is in Her that we live. Without Her this world would not and could not exist.

Said the first - Well I don’t see Her, so it is only logical that She doesn’t exist. There is no god & there is no mother. Only stupid baby believe in existance of god and mother.

To which the second replied -
Sometimes, when you’re in silence and you focus and you really listen, you can perceive Her presence, and you can hear Her loving voice, calling down from above.

By
Lawlesh Gautam