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Thursday, January 2, 2020

January 02, 2020

Ashtaang Yoga Aur Kundalini Jaagran...

अष्टांग योग - षड़चक्र - कुंडलिनी जागरण



मनुष्य देह - भोग और मोक्ष का उत्तम साधन.... निराकार ब्रह्म शिव ने पाच तत्व -भूमि,जल,अग्नि,
वायु और आकाश से १४ ब्रह्माण्ड बनाए.उनमे देव,दानव,यक्ष,किन्नर,चारण,गान्धर्व और मानव सृष्टि बनायी.बाकी सभी कोई एक या दो तत्व से बने हे.एक मनुष्य देह पाच तत्व से बनाया हे.इसलिए ही पाचो तत्व देवता को पाके ही ब्रह्म प्राप्ति हो सकती हे.इसलिए ही कहेते की मनुष्य देह देवताओ को भी दुर्लभ हे.पाचो तत्व से मानव देह बना हे

 मतलब उन पाचो तत्व के देवता - गणेश,शक्ति,सूर्
य,नारायण और रूद्र हमारे शरिर में मोजूद हे.शरिर में पाच चक्र हे वो तत्व देवता की शक्ति वह स्थित हे.हमारे रूशी-मुनियों ने हमें उनका जागरण कर भोग और मोक्ष का मार्ग दिखाया हे,उनको ही कहेते हे कुण्डलिनी शक्ति का जागरण और उपासना.कुण्डलिनी शक्ति जो मूलाधार चक्र में स्थित हे वह से ही जीवन शक्ति का प्रवाह पाचो चक्रों में बहेता रहेता हे.इस पाचो चक्र के तत्व से शरीर की दश इन्द्रिया का सञ्चालन होता हे.जेसे मूलाधार चक्र = भूमि तत्व-देवता गणेश - इष्ट ब्रह्मा-से नाक याने धार्नेंद्रिय और कामेन्द्रिय इस दोनों का संचालन होता हे.भूमिगत हर प्रकार का सुख उनसे प्राप्त किया जा सकता हे. स्वाधिष्ठान चक्र = जल तत्व -देवता ब्रह्मा-इष्ट नारायण-से जीभ [जिह्वा]और क्रोध इस दोनों का संचालन होता हे.हर प्रवाहि रस-रूप की सारी सिध्धिया उसके उपासन से पाई जाती हे.मणिपुर चक्र = अग्नि तत्व -देवता विष्णु-इष्ट रूद्र-से आँख और लोभ का संचालन होता हे.उपासना से दिव्य द्रष्टि याने लाभप्रद मार्ग अपने आप मिलता हे.अनाहत चक्र =वायु तत्व -देवता शिव-इष्ट इश्वर से स्पर्श और मोह का संचालन होता हे.उपासना से निर्मोही बनके विश्व की हर सम्पदा पायी जाती हे.विशुद्ध चक्र =आकाश तत्व -देवता जीव-इष्ट अर्धनारीश्वर सदाशिव से कान [कर्ण]और अहंकार का संचालन होता हे.उपासना से लय योग ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती हे.इस पाच चक्रों की जाग्रति होते ही आज्ञा चक्र में गुरु और परम शिव की शक्ति जागृत होती हे और नाद का प्रगति होता हे.और कुण्डलिनी शक्ति इन सारे चक्रों को भेद के सहस्त्रार चक्र में पहोचाते ही जीव शिव बनता हे.परः ब्रह्म और महादेवी में विलीन होता हे.इस पाचो चक्रों की उपासना के विषय में चक्र के यंत्र दिए है

क्रिया, यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार, ध्यान,धारणा,और समाधि का विषय समजाया हे.......

[१] यम:- सत्य,अहिंसा,दया,क्षमा,मिताह
ार,ब्रह्मचर्य का पालन....

[२] नियम:- जप,तप,व्रत,पूजा,दान,श्रद्धा ,संतोष,सिद्धांत,श्रवण....

[३] आसन:- स्वस्तिकासन,गोमुखासन,वीरासन,पद
मासन,सिंहासन,भद्रासन,मुक्तासन,मयूरासन,ये सब आसान करने से शरीर में जीवन पर्यत कभी भी रोग नहीं होते.

[४] प्राणायाम:- एक आसन में शरीर सीधा रखके बेठे.दाई और की नाक की नस्कोरी से १२३४५६७ गिनते स्वास भरे,स्वास खिचते समय लगे समय से चारगुना समय तक स्वास रोके और दुगने समय बायीं और के नस्कोरी से स्वास छोड़े.अब बायीं और से इसी क्रम से स्वास भरे और दाई और से चोदे.ये एक प्राणायाम हवा.ऐसे चार प्राणायाम करे.धीरे धीरे समय bahda सकते हे....

[५] प्रत्याहार:- स्वस्तिकासन में बैठके लंबा स्वास भरके प्राण को पैर के के अंगुलियों से लेके सर की शिखा तक प्राण रोकना उसे प्रत्याहार कहेते हे...

[६]धारणा:- देह के अंदर पाचो तत्व के देवता की अलग अलग अन्गोमे बिराजे हे एसी धारना करना.

[७] ध्यान:- हमारे रुदय में बेठे शिव में मन लगाना ,वहां चीत को एकाग्र करना .

[८]समाधि:- ध्यान करते करते सारी क्रिया भूल हम शिवमय बन जाते हे वो हे समाधि....

थोड़े दिनोंकी प्रयत्नों से ये सब आसानीसे हो सकता हे.अष्टांग योग अनुसरण के बाद कोई भी उपासना सरलता से की जा सकती हे.आप आपके गुरदेव या कोई भी मार्गदर्शक से विशेष जानकारी पा के उपासना कर सकते हे.

( 1 ) मूलाधार चक्र: -

लं ..बीज का ध्यान कर महागणपति की करो उपासना - पंचतत्व में भुमितत्व के अधिष्ठाता हे महागणपति.शारीर में स्थित मूलाधार चक्र में उनका ध्यान किया जाता हे.मूलाधार चक्र रक्तवर्ण और चतुष्कोण हे.लं बीज हे.महागणपति के गं गणपतये नमः इस मन्त्र से उपासना करके मूलाधार चक्र की महागणपति की पृथ्वीतत्व की शक्ति का जागरण किया जाता हे.भूमि तत्व से सारी भौतिक सुख-समृद्धि मिलती हे.योग्य मार्गदर्शक से निति-नियम जानके ये उपासना कर सकते हे.इस उपासना से जीवन में हर प्रकार की सुख समृद्धि प्राप्त कर सकते हे....

( 2 ) स्वाधिष्ठान चक्र: -

स्वाधिष्ठान चक्र में वं बीज की उपासना - कुण्डलिनी महाशक्ति जागरण के प्रकरण में शरीरस्थ चक्रों के विषय में बताया हे.स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्व हे.वं बीज हे.तत्व देवता ब्रह्मशक्ति हे.इश्वर नारायण हे.जिहव[जीभ]और क्रोध इन्द्रिय हे.आगे के प्रकरण में बताए अनुसार अष्टांग योग का अनुसरण करते हुवे स्वस्तिकासन में टटार बेठे और स्वाधिष्ठान चक्र में जल तत्व में वं बीज का ध्यान करते हुवे उसी स्थान पे वं बीज का जाप करो.इस ध्वनी से धीरे धीरे चक्र की शक्ति का जागरण होगा.जीभ,स्वाद,वाणी,क्रोध पर संयम आएगा.शक्ति जागरण के साथ ही रीढ़ही-सिद्धि सह सुख समृद्धि प्राप्त होगी.सद्गुरु के मार्गदर्शन में सफलता प्राप्त होती हे...

( 3 ) मणिपुर चक्र: -

मणिपुर चक्र में रं बीज की उपासना और हर प्रकार के असाध्य रोगों से भी मुक्ति.निरोगी और तन्दुरस्त और दीर्घायु जीवन का रूशी-मुनियों का यही रहस्य हे.नाभि में स्थित सुवर्ण रंगी चक्र में रं बीज हे.तेज[अग्नि]तत्व हे.तत्व देवता विशु हे.इश्वर रूद्र हे.अष्टांग योग के अनुसरण के साथ ही नाभि में सूर्य और चंद्र नाडी के संयोजन से प्रचुर जीवन शक्ति का पादुर्भाव होता हे.जो किसीभी प्रकार के रोग का नाश करके दीर्घायु प्रदान करती हे.इन्द्रिय आँख और लोभ हे.दिव्य द्रष्टि और दीर्घ दष्टि प्राप्त होने के कारण आगे भविष्य को उज्वल बनाया जा सकता हे.मणिपुर चक्र में रं के नाद से सुर्य जेसी तेजस्वीता प्राप्त होती हे.रं बीज से शरीर में अग्नि तत्व की जागृति से जठराग्नि सतेज होने से पाचन क्रिया श्रेष्ठ बनके शरीर के हर अंश को तेजस्वी बनाती हे.शरीर के रोगों में ९० प्रतिशत रोग पेट से ही होते हे उनका शमन होता हे.मणिपुर चक्र की जागृति के साथ अणिमाँदि सिद्धिया प्राप्त होती हे.मणिपुर चक्र की जागृति के साथ ही साधक के चित-वृति दिव्यता से भरपूर हो जाती हे और आगे की सारी उपासना अपने आप ही सम्पन होती हे.....

( 4 ) अनाहत चक्र: -

अनाहत चक्र में यं बीज की उपासना.=मनुष्य के शरीर में अनाहत चक्र रदय में हे.हरकोई मनुष्य अपने इष्ट का ध्यान हमेशा रदय में करता हे.रक्त रंगी अनाहत चक्र में वायु तत्व में यं बीज स्थित हे.तत्व के देवता महारुद्र और इष्ट इश्वर हे.आदित्य-सूर्य कारक हे.चमड़ी,स्पर्श और मोह इन्द्रिय हे.यं बीज का ध्यान करने से और यं ध्वनी नाद से इस चक्र की जागृति होते ही सर्वलोक आकर्षित होता हे.आत्म-शक्ति प्रबल होती हे.सिद्धिया स्वयं आती हे.हर प्रकार के भोग भुगतते हुवे भी मनुष्य विरक्त रहेता हे.मानुष लोक के अलावा अन्यलोक की दिव्य सृष्टि से संपर्क होता हे.सत्य,अहिंसा,
दया और प्रेम इन चारों सद्गुणों के के साथ मनुष्य धेर्य्वान बनता हे.इस चक्र की जागृति के साथ ही ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग सरल बन जाता हे....

( 5 ) विशुद्ध चक्र: -

विशुद्ध चक्र हं बीज की उपासना = मानव शरीर में कंठ के पास विशुद्ध चक्र हे.धूम्र वर्ण हे.आकाश तत्व में हं बीज स्तित हे.तत्व देवता जीव हे और इष्ट सदाशिव हे.कर्ण[कान]और अहंकार इन्द्रिय हे.इस चक्र की उपासना से हमारे शरीर के शिव और शिवा का तत्व समजा जाता हे.लय योग साध्य हो जाता हे.ब्रह्माण्ड के हर लोक से संपर्क बनता हे.पश्यन्ति वाणी साध्य हो जाती हे.मिथ्याभिमान का नाश होता हे और अहं ब्रह्मासमी तत्व का ज्ञान होता हे.इस तत्व की जागृति के साथ ही अग्या चक्र के तत्व देवता गुरु की कृपा होती हे और सहस्त्रार चक्र में परःब्रह्म की अनुभूति सहज हो जाती हे.परमहंस कक्षा की स्थिति में स्वयं ही ब्रह्म अंश बना देती हे.शरीर की उपासना की इस यौगिक प्रक्रिया को विस्तृत नहीं लिखा जाता.क्युकी हर मनुष्य केलिए प्रक्रिया भिन्न हो जाती हे 

Sunday, December 29, 2019

December 29, 2019

Gayatri Mantra ki Mahima...

गायत्री मंत्र की महिमा: -




किसी गायत्री-निष्ठ सज्जन का प्रश्न है कि गायत्री-मन्त्र का वास्तविक अर्थ क्या है?

गायत्री-मन्त्र के द्वारा किस स्वरूप से किस देवता का ध्यान किया जाय?

कोई गोरूपा गायत्री का, कोई आदित्यमण्डलस्था श्वेतद्मस्थिता किसी देवी का ध्यान करना बतलाते हैं।

कोई ब्रह्माणी, रुद्राणी, नारायणी का ध्यान उचित समझते हैं, कहीं पंचमुखी गायत्री का ध्यान बतलाया गया है, तो कोई राधा-कृष्ण का ध्यान समुचित मानते हैं।

ऐसी स्थिति में बुद्धि में भ्रम होता है कि गायत्री-मन्त्र का मुख्य अर्थ और ध्येय क्या है?

इस सम्बन्ध में यद्यपि शास्त्रों में बहुत कुछ विवेचन है, तथापि यहाँ संक्षेप में कुछ लिखा जाता है------

‘बृहदारण्यक[ 5/14] में

"भूमि अन्तरिक्ष, द्यौः' इन आठ अक्षरों को गायत्री का प्रथम पाद कहा है,।

‘"ऋचो यजूंषि सामानि’"इन आठ अक्षरों को गायत्री का द्वितीय पाद कहा गया है,!

" ‘प्राणाऽपनो व्यानः’"इन आठ अक्षरों को गायत्री का तीसरा पाद माना गया है।

इस तरह लोकात्मा, वेदात्मा एवं प्राणत्मा ये तीनों ही गायत्री के तीन पाद हैं।

परब्रह्म परमात्मा ही चतुर्थ पाद है।

‘‘भूमिरन्तरिक्षम’’ इन श्रुतियों पर व्याख्या करते हुए आचार्य शंकर कहते हैं----

कि सम्पूर्ण छन्दों में गायत्री छन्द प्रधान है, क्योंकि वही छन्दों के प्रयोक्ता गयाख्य प्राणों का रक्षक है।

सम्पूर्ण छन्दों का आत्मा प्राण है, प्राण का आत्मा गायत्री है।

क्षत से रक्षक होने के कारण प्राण क्षात्र है, प्राणों का रक्षण करने वाली गायत्री है।

द्विजोत्तम जन्म का हेतु भी गायत्री ही है।

गायत्री के तीनों पादों की उपासना करने वालों को लोकात्मा, वेदात्मा और प्राणत्मा के सम्पूर्ण विषय उपनत होते हैं।

गायत्री का चतुर्थ पाद ही ‘तुरीय’ शब्द से कहा जाता है। जो रजोजात सम्पूर्ण लोको को प्रकाशित करता है, वह सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुष है।

जैसे वह पुरुष सर्वलोकाधिपत्य की श्री एवं यश से तपता है, वैसे ही तुरीय पाद वेदिता श्री और यश से दीप्त होता है।
गायत्री सम्पूर्ण वेदो की जननी। जो गायत्री का अभिप्राय है, वही सम्पूर्ण वेदों का अर्थ है।

विश्व-तैजस-प्राज्ञ, विराट-हिरण्यगर्भ अव्याकृत, व्यष्टि-समष्टि जगत तथा उसकी जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति- यह तीनों अवस्थाएँ प्रणव अ, उ, म इन तीनों मात्राओं के अर्थ हैं।
सर्वपालक परब्रह्म प्रणव का वाच्यार्थ सर्वाधिष्ठान, सर्वप्रकाशक, सगुण, सर्वशक्ति, सर्वरहित ब्रह्म प्रणव का लक्ष्यार्थ है।

उत्पादक, पालक संहारक त्रिविध लोकात्मा भगवान तीनो व्याहृतियों के अर्थ हैं।

जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहार-कारण परब्रह्म ही ‘सवितृ’ शब्द का अर्थ है।

तथापि गायत्री द्वारा विश्वोंत्पाद, स्वप्रकाश परमात्मा के उस रमणीय चिन्मय का ध्यान किया जाता है, जो समस्त बुद्धियों का प्रेरक एवं साक्षी है।

विश्वोत्पादक परमात्मा के वरेण्य गर्भ को बुद्धिप्रेरक एवं बुद्धिसाक्षी कहने से जीवात्मा और परमात्मा का अभेद परिलक्षित होता है, अतः साधनचतुष्ट सम्पन्न उत्तमाधिकारी के लिये प्रत्यक चैतन्याभिन्न, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, परब्रह्म का ही चिन्तन गायत्री-मन्त्र के द्वारा किया जाता है।

अनन्त कल्याण गुण सम्पन्न, सगुण, निराकार परमेश्वर की उपासना गायत्री के द्वारा किया जा सकता है। सगुण, साकार, सच्चिदानन्द परब्रह्म का ध्यान गायत्री के द्वारा किया जा सकता प्राणिप्रसवार्थक ‘सङ्’ धातु से ‘सवितृ’ शब्द की निष्पत्ति होती है।

यहाँ उत्पत्ति को उपलक्षण मानकर उत्पत्ति, स्थिति एवं लय का कारण पर-ब्रह्म ही ‘सवितृ’ शब्द का अर्थ है। इस दृष्टि से उत्पादक, पालक, संहारक जो भी देवता प्रमाणसिद्ध हैं, वे सभी गायत्री के अर्थ हैं।

उत्पादक पालक संहारक- ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा उनकी स्वरूपभूत तीनों शक्तियों का ध्यान किया जाता है।
त्रैलोक्य, त्रैविद्य तथा प्राण जिस गायत्री के स्वरूप हैं, वह त्रिपदा गायत्री परोरजा आदित्य में प्रतिष्ठित हैं, क्योंकि आदित्य ही मूर्त-अमूर्त तो दोनों ही का रस है।
इसके बिना सब शुष्क हो जाते हैं, अतः त्रिपदा गायत्री आदित्य में प्रतिष्ठित है।

आदित्यः चक्षुः- स्वरूप सत्ता में प्रतिष्ठित है। वह सत्ता बल अर्थात प्राण में प्रतिष्ठित है, अतः सर्वाश्रयभूत प्राण ही परमोत्कृष्ट है।

गायत्री अध्यात्म प्राण में प्रतिष्ठित है। जिस प्राण में सम्पूर्ण देव, वेद कर्मफल एक हो जाते हैं, वही प्राणस्वरूपा गायत्री सबकी आत्मा है।

शब्दकारी वागादि प्राण ‘गय’ हैं, उनका त्राण करने वाली गायत्री है।

आचार्य अष्टवर्ष के बालक को उपनीत करके जब गायत्री का प्रदान करता है। तब जगदात्मा प्राण ही उसके लिये समर्पित करता है। जिस माणवक को आचार्य गायत्री का उपदेश करता है, उसके प्राणों का त्राण करना है, नरकादि पतन से बचा लेता है।

गायत्री के प्रथम पाद को जानने वाला यति यदि धनपूर्ण तीनों लोकों दान ले तो भी उसे कोई दोष नहीं लगता।
जो द्वितीय पाद को जानता है, वह जितने में त्रयी विद्यारूप सूर्य तपता है, उन सब लोको को प्राप्त कर सकता है।
तीसरे पाद को जानने वाला सम्पूर्ण प्राणिवर्ग को प्राप्त कर सकता है।

सारांश यह है कि यदि पादत्रय के समान भी कोई दाता-प्रतिग्रहीता हो, तब भी गायत्रीविद को प्रतिग्रहदोष नही लगता, फिर चतुर्थ पाद के वेदिता के लिये तो ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जो उसके ज्ञान का फल कहा जा सके।

वस्तुतः त्रिपाद विज्ञान का भी प्रतिग्रह दोष नहीं लगता फिर चतुर्थ पाद के वेदिता के लिये तो ऐसी कोई वस्तु ही नहीं है, जो उसके ज्ञान का फल कहा जा सके।

वस्तुतः त्रिपाद-विज्ञान का भी प्रतिग्रह से अधिक ही फल होता है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कौन ले सकता है?

गायत्री के उपस्थान-मन्त्र में कहा गया है कि ....
हे गायत्रि! आप त्रैलोक्यरूप पाद से एक पदी हो, त्रयी वि़द्यारूप पाद से द्विपदी हो, प्राणदि तृतीय पाद से त्रिपदी हा, चतुर्थ तुरीय पाद से चतुष्पदी हो।

इस तरह चार पाद से मन्त्रों द्वारा आपकी उपासना होती है। इसके बाद अपने निरूपाधिक आत्मास्वरूप से अपद हो, ‘नेति-नेति’ इत्यादि निषधों से वह सर्वनिषेधों का अवधिरूप से बोधित सम्पूर्ण व्यवहारों का अगोचर है, अतः प्रत्यक्ष परोरजा आपके तुरीय पाद को हम प्रणाम करते हैं।

आपकी प्राप्ति में विघ्नकारी पापी, आपकी प्राप्ति में विघ्नसम्पादन-लक्षण अपने अभीष्ट को प्राप्त न करें इस अभिप्राय से अथवा जिससे दोष हो, उसके प्रति भी अमुक व्यक्ति अमुक अभिप्रेत फल को प्राप्त न करें, मैं अमुक फल पाऊँ, ऐसी भावना से वह मिल जाता है।

गायत्री का अग्नि ही मुख है। अग्नि-मुख को जानने से ही एक गायत्रीविद हाथी बनकर जनक का बाहन बना था।
जैसे अग्नि से अधिक-से-अधिक ईधन समाप्त हो जाता है, वैसे ही अग्नि-मुख गायत्री के ज्ञान से सब पाप समाप्त हो जाते हैं।

‘छान्दोग्योनिषद’ में कहा गया है कि यह सम्पूर्ण चराचर भूत प्रपंच गायत्री ही है। किस तरह सब कुछ गायत्री है, इस पर कहा गया है कि वाक ही गायत्री है, वाक ही समस्त भूतों का गान एवं रक्षण करती है। गो, अश्व, महिषि, ‘मा भैषीः’ इत्यादि वचनों से वाक द्वारा ही भय की निवृत्ति होती है।

गायत्री को पृथ्वी रूप मानकर उसमें सम्पूर्ण भूतों की स्थिति मानी गयी है, क्योंकि स्थावर जंगम सभी प्राणिवर्ग पृथ्वी में ही रहते हैं, कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। पृथ्वी को शरीररूप मानकर उसमें सम्पूर्ण प्राणों की स्थिति मानी गयी है।

शरीर को हृदय का रूप मानकर उसमें सम्पूर्णं प्राणों की प्रतिष्ठा कही गयी है।

इस तरह चतुष्पाद, षडक्षरपाद, गायत्री, वाक, भूत, पृथ्वी, शरीर, हृदय प्राणरूपा षडविधा गायत्री का वर्णन है। पुनश्च, सम्पूर्ण विश्व को एकपादमात्र कहकर अन्त में त्रिपाद ब्रह्म को पृथक कहा है।

इसके अतिरिक्त पूर्व कथनानुसार गायत्री-मन्त्र के द्वारा सगुण, निर्गुण किसी भी ब्रह्मस्वरूप की उपासना की जा सकती है।
उत्पत्ति शक्ति ब्रह्माणी, पालिनी शक्ति, नारायणी, संहारिणीशक्ति रुद्राणी का ध्यान गायत्री-मन्त्र के द्वारा सुतरां हो सकता है।

राम, कृष्ण, विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, गणेश आदि जिन-जिनमें विश्वकारणता, सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता प्रमाण सिद्ध है, वे सभी परमेश्वर हैं, सभी गायत्री-मन्त्र के अर्थ हैं।

इस दृष्टि से अपने इष्ट देवता का ध्यान गायत्री-मन्त्र द्वारा सर्वथा उपयुक्त है।

‘सविता’ शब्द सूर्य के सम्बन्ध में विशेष प्रसिद्ध है, अतः उसी की सारशक्ति सावित्री को आदित्यमण्डलस्थ भी कहा गया है।
महर्षि कण्व ने अमृतमय दुग्ध से मही को पूर्ण करती हुई गोरूप से गायत्री का अनुभव किया था-

‘‘तां सवितुर्वरेण्यस्य चित्रामहं वृणे सुमतिं विश्वजन्यां।
यामस्य कण्वो अदुहत् प्रपीनां सहस्रधारो पयस्त महीं गाम्।।’’

विश्वमाता, सुमतिरूपा वरेण्य सविता की गर्भस्वरूपा गायत्री का मैं वरण करता हुँ, जिसको कण्व ने हजारों पयोधारा से महीमण्डल को पूर्ण करते हुए देखा।

मोती, मूँगा, सुवर्ण, नील धवलकान्तिवाले पाँच मुखों, तीन-तीन नेत्रों से युक्त, इन्द्रनिबद्ध रत्नों के मुकुटों को धारण किये, वरद, अभ्य, अंकुश कशा, सुभ, कपाल गुण, शंख, चक्र, अरविन्द-युगल दोनों ही तरफ के हाथों में लिये हुए भगवती का ध्यान करना चाहिए।

पंचतत्त्वों एवं पंच देवताओं की सारभूत महाशक्ति एकत्रित होकर पंचमुखी भगवती के रूप में प्रकट है।

‘‘मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै-
र्युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थंवर्ण
ात्मिकाम्।

गायत्रीं वरदाभयांकुशाः शुभ्रं कपालं गुणं
शंख चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्ती भजे।।’’

इस स्वरूप के ध्यान में सगुण-निर्गुण दोनों ही ब्रह्मरूप आ जाते हैं। दिव्य-कमल पर विराजमान, मनोहर भूषण अलंकारों से विभूषित, सुसज्जित उपर्युक्त स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।

गायत्री मन्त्र का जप चाहे किसी स्थान, समय एवं स्थिति में नहीं किया जा सकता।

इसके लिये पवित्र देश-काल तथा पात्र की अपेक्षा है, तभी वह त्राण कर सकती है।

साभार
करपात्री जी महाराज
December 29, 2019

शरीर एक किला है...

भगवान कृष्ण कहते हैं कि, हमारा यह शरीर एक किला के समान है। जिसके प्रमुख 9 छिद्र या दरवाजे हैं। आत्मा इसी 9 दरवाजे वाले शरीर मे निवास करती है। ये नौ दरवाजे मे से किसी एक से समान्यतः अंत काल मे आत्मा निकलती है, और उसी के अनुसार उसकी गति होती है। जैसे मुख से प्रस्थान करने पर उत्तम मनुष्य, कान से प्रस्थान करने पर पक्षियों की योनि प्राप्त होती है। 



यह शरीर एक नगर है! प्रज्ञा इसकी चहार दीवारी हौ है! हड्डियाँ खम्भे हैं! चमड़ा इस नगर की दीवार है जो समूचे नगर को रोके है! माँस और रक्त के पंक का इस पर लेप चढ़ा हुआ है! इस नगर मे नौ दरवाजा है, इसकी रक्षा मे बहुत प्रयत्न करना पड़ता है, नस नाड़ियाँ घेरे हुए हैं, चेतन पुरूष नगर के भीतर राजा के रूप मे विराजमान है उसके दो मन्त्री हैं - बुद्धि और मन! दोनों परस्पर विरोधी हैं, और आपस मे वैर निकालने का यत्न करते रहते हैं, राजा के चार शत्रु हैं - काम, क्रोध., लोभ, मोह! जो उसका नाश चाहते है, जब तक राजा नौ दरवाजों को बन्द किये रहता है तब तक सुरक्षित रहता है!

 परन्तु जब नगर के सभी दरवाजे खुला छोड़ देता है राग नामक शत्रु नेत्र आदि द्वारो पर आक्रमण कर देता है! वह हर जगह व्याप्त रहता है, बहुत विशाल और पॉच दरवाज़ो से नगर में प्रवेश करता है! उसके साथ तीन भंयकर शत्रु प्रवेश करते है, पॉच इन्द्रिय नामक द्वारो से शरीर में प्रवेश करके राग, मन तथा अन्यान्य इन्द्रयो के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है और मन तथा इन्द्रयो को वश मे करके वह दुर्धर्ष हो जाता है! और समस्त दरवाजों को काबू में करके चहार दीवारी को नष्ट कर देता है, मन को राग के अधीन देखकर बुद्धि पलायन कर जाती है, नष्ट हो जाती है, जब मन्त्री साथ नहीं रहते तब अन्य पुरबासी भी साथ छोड़ देते है! फिर शत्रुओं को उसके छिद्र का ज्ञान हो जाने से राजा उनके द्वारा नाश को प्राप्त होता है! इस प्रकार राग, मोह, लोभ तथा क्रोध -ये दुरात्मा शत्रु मनुष्य की स्मरण -शक्ति का नाश करने वाले हैं, राग से काम होता है, काम से लोभ का जन्म होता है, लोभ से सम्मोह - अविवेक. होता है! और सम्मोह से स्मरण शक्ति भ्रान्त हो जाती है, स्मृति की भ्रान्ति से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य स्वयं भी नष्ट हो जाता है --कर्तव्य भ्रष्ट हो जाता है!

"इन्द्रिय अश्व शरीर रथ , मन को मानो बाग ।
बुद्धि सारथी ले चला , भोग विषय अनुराग ।।"

शरीर रुपी रथ के धर्म - अधर्म रुपी दो पहिए , और दस प्राण रुपी धुरी हैँ । जिस पर जीवरुपी महारथी सवार होकर औँकार रुपी धारण किये हुए , उसका वेधनीय लक्ष्य परब्रह्म है । राग , द्वेष , लोभ , शोक , मोह , भय , मद , मान , अपमान , निन्दा , माया, हिँसा , मत्सर , प्रमाद , क्षुधा , निद्रा , रजोगुणी , और तमोगुणी , स्वभाव ये सभी शत्रुरुप हैँ । किन्तु कभी कभी परोपकारादि युक्त सतोगुणी स्वभाव भी शत्रुरुप हो जाते हैँ । अतःजब तक इस रथरुपी देह के अंग और आत्मा वश मेँ रहेँ , तब तक गुरुजनोँ की चरण कृपा एवं भगवान के बल से उपरोक्तशत्रुओँ को नष्ट करके परमात्मा की शरण लेकर मोक्षरुपी कीर्ति के प्रकाश से समन्वित होकर शरीर छोड़ दे।

समय रहते ऐसा न करने पर यही इन्द्रिय रुपी अश्व और बुद्धि रुपी सारथी अधर्म मार्ग पर चलकर विषय रुपी चोरो के मध्य डाल देते है , तब वे चोर संसार रुपी घोर चक्र मे धकेल देते है जीवन के पीछे छः चोर -
"काम , क्रोध , लोभ ,मोह , मद , मत्सर लगे है ।"

गृहस्थाश्रम एक किला है । पहले उसमेँ रहकर ही लडना उत्तम है। ये छः शत्रु तो वन मे भी साथ आकर सताते हैँ ।
अतः उन छः शत्रुरुपी विकारो को हराना है।

काम , क्रोध , लोभ ,मोह , मद , मत्सर को जीतना है ।
इन छः शत्रुओ का विजेता गृहस्थ होते हुए भी वनवासी जैसा ही होता है। गृहस्थाश्रमी रहकर इन छः विकारोँ को कुचलना सरल है ।

सुखी होना है तो अपने चालीसवेँ वर्ष मेँ वनगमन
करना चाहिए ।

यह शरीर रथ है और श्रोत्र , त्वक् , जिह्वा , चक्षु , नासिका , ये ज्ञानेन्द्रियाँएवं वाक् , हाथ , पैर , गुदा , और उपस्थ (जननेन्द्रियाँ ) दस इन्द्रियाँ घोड़े । इन्द्रियोँ का नियन्ता मन ही घोड़ो की बागडोर है । शब्द रुप रस गन्ध स्पर्श विषय विभिन्न मार्ग हैँ । बुद्धि इस रथ को चलाने वालासारथी है । इस रथ को बाँधने के लिए ईश्वर ने चित्तरुप बंधन बनाया है । हृदय मेँ प्राणवायू , गुदा मेँ अपानवायु , नाभिमण्डल मेँ समानवायु , कण्ठदेश मेँ उदानवायु , सम्पूर्ण शरीर मेँ व्यानवायु , उदगार (डकार या वमन) मेँ नागवायु , उन्मीलन कराने वाला कूर्मवायु , क्षुधा बढ़ाने वाला कृकल वायु , जँभाई कराने वाला वाला देवदत्तवायु , और सर्वव्यापी धनञ्जय वायु जो मृत्यु के बाद भी मृत शरीर को नहीँ छोड़ता है ये दस प्राण इस रथ की धुरी है । धर्म और अधर्म पहिए हैँ ।

जिसमे अहंकारी जीव बैठता है। ओँकार धनुष है और शुद्ध जीवन बाण । परब्रह्म लक्ष्य है, राग द्वेष लोभ शोक मोह काम क्रोध भय मान अपमान असूया हिँसा मत्सर रजोगुण प्रमाद क्षुधा निद्रा आदि शत्रु हैँ । जब तक मनुष्य का देहरुपी रथ उसके वश मेँ है , उतने समय मनुष्य को सद्गुरुओँ के चरणोँ की सेवा करके , तीक्ष्ण ज्ञानरुपी तलवार लेकर , श्रीभगवान का बल धारण करके राग द्वेषादि शत्रुओँ को जीत ले और तत्पश्चात शांत होकर स्वानंदरुपी स्वराज्य से संतुष्ट होकर शरीर रथ को भी त्याग दे ।

अन्यथा रथ मे विराजमान प्रमादी जीव को तथा दुष्ट इन्द्रियरुपी घोड़ो को बुद्धरुपी सारथी अयोग्य मार्ग पर ले जाकर विषय रुपी चोरो के अधीन कर देगा । वे चोर घोड़ो और सारथी सहित शरीर रुपी रथ को अंधकारव्याप्त और महामृत्यु के भय से पूर्ण संसाररुपी कुएँ मेँ फेँक देगे ।

Friday, December 27, 2019

December 27, 2019

सृष्टि आरंभ...

बृहदारण्यकोपनिषद् उपनिषद् के अनुसार सृष्टि के पहले केवल ब्रह्म था। वह अव्याकृत था। उसने अहंकार किया जिससे उसने व्याकृत सृष्टि उत्पन्न की; दो पैरवाले, चार पैरवाले, पुर उसने बनाए और उनमें पक्षी बनकर पैठ गया। उसने अपनी माया से बहुत रूप धारण किए और इस प्रकार नाना रूप से भासमान ब्रह्माण्ड की रचना करके उसमें नखाग्र से शिक्षा तक अनुप्रविष्ट हो गया। शरीर में जो आत्मा है वही ब्रह्मांड में व्याप्त है और हमें जो नाना प्रकार का भान होता है वह ब्रह्म रूप है। पृथ्वी, जल, और अग्नि उसी के मूर्त एवं वायु तथा आकाश अमूर्त रूप हैं।



स्त्री, संतान अथवा जिस किसी से मनुष्य प्रेम करता है वह वस्तुत: अपने लिए करता है। अस्तु, यह आत्मा क्या है, इसे ढूँढना चाहिए, ज्ञानियों से इसके विषय में सुनना, इसका मनन करना और समाधि में साक्षात्कार करना ही परम पुरुषार्थ है।

'चक्षुर्वै सत्यम्' अर्थात् आँख देखी बात सत्य मानने की लोकधारणा के विचार से जगत् सत्य है, परंतु वह प्रत्यक्षत: अनित्य और परिवर्तनशील है और निश्चय ही उसके मूल में स्थित तत्व नित्य और अविकारी है। अतएव मूल तत्व को 'सत्य का सत्य' अथवा अमृत कहते हैं। नाशवान् 'सत्य' से अमृत ढँका हुआ है।

अज्ञान अर्थात् आत्मस्वरूप को न जानने के कारण मनुष्य संसार के नाना प्रकार के व्यापारों में लिपटा हुआ सांसारिक वित्त आदि नाशवान पदार्थों से अक्षय सुख की व्यर्थ आशा करता है। कामनामय होने से जिस उद्देश्य की वह कामना करता है तद्रूप हो जाता हैं; पुण्य कर्मों से पुण्यवान् और पाप कर्मों से पापी होता और मृत्यु काल में उसके प्राण उत्क्रमण करके कर्मानुसार मृत्युलोक, पितृलोक अथवा देवलोक प्राप्त करते हैं। जिस देवता की वह उपासना करता है मानो उसी का पशु हो जाता है। यह अज्ञान आत्मा की 'महती विनष्टि' (सब से बड़ी क्षति) है।


आत्मा और ब्रह्म एक हैं। ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जिसे नानात्व दिखता है वह मृत्यु से मृत्यु की ओर बढ़ता है। आत्मा महान्, अनंत, अपार, अविनाशी, अनुच्छित्तिधर्मा और विज्ञानधन है। नमक की डली पानी में घुल जाने पर एकरस हो जाने से जैसे नमक और पानी का अभेद हो जाता है, ब्रह्मात्मैक्य तद्रूप अभेदात्मक है। जिसे समय साधक हो यह अपरोक्षानुभूति हो जाती है कि मैं ब्रह्म हूँ और भूतात्माएँ और मैं एक हूँ उसके द्रष्टा और दृष्टि, ज्ञाता और ज्ञेय इत्यादि भेद विलीन हो जाते हैं, और वह 'ब्रह्म भवतिय एवं वेद' - ब्रह्मभूत हो जाता है। उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, वह यहीं जीवन्मुक्त हो जाता है। वह विधि निषेध के परे है। उसे संन्यास लेकर भैक्ष्यचर्या करनी चाहिए। यह ज्ञान की परमावधि, आत्मा की परम गति और परमानंद है जिसका अंश प्राणियों का जीवनस्त्रोत है।

यह शोक-मोह-रहित, विज्वर और विलक्षण आनंद की स्थिति है जिससे ब्रह्म को 'विज्ञानमानंदंब
्रह्म' कहा गया है। यह स्वरूप मन और इंद्रियों के अगोचर और केवल समाधि में प्रत्यक्षानुभूति का विषय एवं नामरूप से परे होने के कारण, ब्रह्म का 'नेति नेति' शब्दों द्वारा अंतिम निर्देश है।

आत्मसाक्षात्कार के लिए वेदानुबंधन, यज्ञ, दान और तपोपवासादि से चित्तशुद्धि करके सूर्य, चंद्र, विद्युत्, आकाश, वायु, जल इत्यादि अथवा प्राणरूप से ब्रह्म की उपासना का निर्देश करते हुए आत्मचिंतन सर्वश्रेष्ठ उपासना बतलाई गई है।
शान्ति मन्त्र संपादित करें

इस उपनिषद का शान्तिपाठ निम्न है:

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

इस उपनिषद् का प्रसिद्ध श्लोक निम्नलिखित है -
ॐ असतोमा सद्गमय।
तमसोमा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय ॥

ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः ॥ – बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28.

निम्नलिखित श्लोक वृहदारण्यक उपनिषद के आरम्भ और अन्त में आता है-

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
December 27, 2019

Who is God: भगवान कौन हैं ?


हमारे ब्रहमांड में ब्रह्मा जी आदि जीव हैं जो (गर्भोदक्षायी ) विष्णु के नाभि कमल से उत्पन्न हुए | सैंकड़ो दिव्य वर्षों की तपस्या के बाद उनके हृदय में भगवान प्रकट हुए तथा वे शेष नाग की शैय्या पर लेटे हुए भगवान को देख पाये | भगवान ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी को श्रीमदभागवतम का सार ४ श्लोक में (चतु:श्लोकी) प्रदान किया |




भगवान कहते है: हे ब्रह्मा, वह मैं ही हूँ जो सृष्टि के पूर्व विद्यमान था, जब मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं था तब इस सृष्टि की कारण स्वरूपा भौतिक प्रकृति भी नहीं थी जिसे तुम अब देख रहे हो वह भी मैं ही हूँ और प्रलय के बाद भी जो शेष रहेगा वह भी मैं ही हूँ (श्रीमद भागवत २.९.३३) |

 हे ब्रह्मा ! जो भी सारयुक्त प्रतीत होता है, यदि वह मुझसे सम्बंधित नहीं है तो उसमें कोई वास्तविकता नहीं है | इसे मेरी माया जानो, इसे ऐसा प्रतिबिम्ब मानो जो अंधकार में प्रकट होता है (श्रीमद भागवत २.९.३४) |

 हे ब्रह्मा ! तुम यह जान लो की ब्रह्माण्ड के सारे तत्व विश्व में प्रवेश करते हुए भी प्रवेश नहीं करते है | उसी प्रकार मैं उत्पन्न की गयी प्रत्येक वस्तु में स्थित रहते हुए भी साथ ही साथ प्रत्येक वस्तु से पृथक रहता हूँ (श्रीमद भागवत २.९.३५) |

हे ब्रह्मा ! जो व्यक्ति परम सत्य रूप श्री भगवान की खोज में लगा हो उसे चाहिये की वह समस्त परिस्थतियों में सर्वत्र और सर्वदा प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से इसकी खोज करे (श्रीमद भागवत २.९.३६) |

हृदय में ज्ञान उदय होने के बाद ब्रह्मा जी कहते है (ब्रह्म संहिता ५.१):

ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द: विग्रह:,
अनादिरादि गोविन्द: सर्व कारण कारणम: |

भगवान तो कृष्ण है, जो सच्चिदानन्द (शास्वत,ज्ञान तथा आनन्द के) स्वरुप है | उनका कोई आदि नहीं है , क्योकि वे प्रत्येक वस्तु के आदि है | वे समस्त कारणों के कारण है |
ब्रह्मा जी कहते है: जो वेणु बजाने में दक्ष है, खिले कमल की पंखुड़ियों जैसे जिनके नेत्र है, जिनका मस्तिक मोर पंख से आभूषित है, जिनके अंग नीले बादलों जैसे सुन्दर है, जिनकी विशेष शोभा करोड़ों काम देवों को भी लुभाती है, उन आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ (ब्रह्म संहिता ५.३0)|

वे आगे कहते है: मै उन आदि भगवान गोविंद की पूजा करता हूँ, जो अपने विविध पूर्ण अंशो से विविध रूपों तथा भगवान राम आदि अवतारों के रूप में प्रकट होते है किन्तु जो भगवान कृष्ण के अपने मूल रूप में स्वयं प्रकट होते है (ब्रह्म संहिता ५.३९) |

 ब्रह्मा जी ने ब्रह्म संहिता में प्रत्येक श्लोक के अंत में लिखा है : आदिपुरुष गोविन्द का मैं भजन करता हूँ |ब्रह्माजी अपने लोक में भगवान गोविंद की पूजा अठारह अक्षरों वाले मन्त्र से करते हे जो इस प्रकार है: क्लिम कृष्णाय गोविन्दाय गोपिजन्वल्लाभय स्वाहा |

श्री कृष्ण सर्व आकर्षक तथा समस्त आनंद के श्रोत हैं, वे षड-एश्वेर्य पूर्ण अर्थात (असीमित) ज्ञान, धन, बल, यश, सोन्दर्य तथा त्याग से युक्त हैं l श्री कृष्ण परम ईश्वर,परम पुरुष,परम नियंता, समस्त कारणों के कारण है यही परम सत्य है | श्री कृष्ण समस्त यज्ञों तथा तपस्याओ के परम भोक्ता, समस्त लोको तथा देवताओ के परमेश्वर है (भ. गी. ५.२९) |

श्री कृष्ण की शक्ति से ही सारे लोक अपनी कक्षाओ में स्थित रहते है (भ. गी. १५.१३) | ब्रह्मादि सहित सभी देवगण उनके नियंत्रण में कार्य कर रहे है जिस प्रकार नाक में रस्सी पड़ा बैल अपने स्वामी द्वारा नियंत्रित किया जाता है (श्रीमद भागवत ४.११.२७) | जिस प्रकार अग्नि का प्रकाश अग्नि के एक स्थान पर रहते हुए चारो और फैलता है उसी प्रकार भगवान की शक्तियां इस सारे ब्रह्मांड में फैली हुई है (विष्णु पुराण १.२२.५३) |

श्री कृष्ण ही भगवान है, जिनके तीन पुरुष अवतार है | सर्व प्रथम कारणोदक्षायी विष्णु (महाविष्णु) जिनके उदर में समस्त ब्रह्माण्ड हैं तथा प्रत्येक श्वास चक्र के साथ ब्रह्माण्ड प्रकट तथा विनिष्ट होते रहते है | दूसरा अवतार है; गर्भोदक्षायी विष्णु जो प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट करके उसमें जीवन प्रदान करते हैं तथा जिनके नाभि-कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए | तीसरे अवतार है क्षीरोदक्षायी विष्णु जो परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में तथा सृष्टि के प्रत्येक अणु में उपस्थित हो कर सृष्टिका पालन करते है |

जिनके श्वास लेने से ही अनन्त ब्रह्मांड प्रवेश करते है तथा पुनः बाहर निकल आते है, वे महाविष्णु कृष्ण के अंशरूप है | अतः मै गोविंद या कृष्ण की पूजा करता हूँ जो समस्त कारणों के कारण है (ब्रह्म संहिता ५.४८) | श्री कृष्ण विष्णु के रूप में उसी प्रकार विस्तार करते है जिस प्रकार एक जलता दीपक दूसरे को जलाता है यधपि दोनों दीपक की शक्ति में कोई अंतर नहीं होता तथापि श्री कृष्ण आदि दीपक के समान है (ब्रह्म संहिता ५.४६) | कृष्ण स्वांश नारायण से भी श्रेष्ठ है क्योंकि उनमे ४ विशेष दिव्य गुण है: उनकी अद्भुत लीलाये, माधुर्य-प्रेम के कार्यकलापो में सदा अपने प्रिय भक्तो से घिरा रहना (यथा गोपियाँ), उनका अद्भुत सोन्दर्य तथा उनकी बाँसुरी की अद्भुत ध्वनि (चै. च. मध्यलीला २३.८२-८४) |

श्रीमदभागवतम में सारे अवतारों के वर्णन के बाद सूतजी कहते है: उपर्युक्त परमेश्वर के ये सारे अवतार या तो भगवान के पूर्ण अंश या पूर्णांश के अंश (कलाएँ) हैं, लेकिन श्रीकृष्ण स्वयं पूर्ण पुरोषत्तम भगवान (कृष्णस्तु भगवान् स्वयं) हैं | वे प्रत्येक युग में इन्द्र के शत्रुओं (असुओं) द्वारा उपद्रव किये जाने पर अपने विभिन्न स्वरूपों के माध्यम से जगत की रक्षा करने के लिए प्रकट होते हैं (श्रीमद भागवत १.३.२८) |

जब जब धर्म की हानि होती है और पापकर्मों की वृद्धि होती है तब तब परम नियंता भगवान श्री हरि स्वेच्छा से स्वयं प्रकट होते है (श्रीमद भागवत ९.२४.५६) | गीता (४.७) में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते है “हे भारत ! जब जब और जहाँ जहाँ धर्म का ह्रास होता है और अधर्म की प्रधानता होती है तब तब मै स्वयं अवतार लेता हूँ ” |

शिवजी: जो व्यक्ति प्रकृति तथा जीवात्मा में से प्रत्येक के अधीष्ठाता भगवान कृष्ण के शरणागत हैं, वे वास्तव में मुझे अत्यधिक प्रिय हैं (श्रीमद भागवत ४.२४.२८) | जो व्यक्ति अपने वर्णाश्रम धर्म को १०० वर्षो तक समुचित रीति से निभाता हे वह ब्रह्मा के पद को प्राप्त कर सकता हे | उस से अधिक योग्य होने पर वह मेरे पास पहुँच सकता हे | किन्तु भगवान का शुद्ध भक्त सीधा वैकुण्ठ में जाता हे , जबकि में तथा अन्य देवता इस संसार के संहार के बाद ही इन लोक को प्राप्त कर पाते हैं (श्रीमद भागवत ४.२४.२९) | हे भगवान, मेरा मन तथा मेरी चेतना आपके पूजनीय चरण-कमलो पर स्थिर रहती है जो समस्त वरों तथा इच्छाओं की पूर्ति के स्त्रोत होने के कारण समस्त मुक्त महामुनियो द्वारा पूजित हैं (श्रीमद भागवत ४.७.२९) |

नारद: मैं उन निर्मल कीर्ति वाले भगवान कृष्ण को नमस्कार करता हूँ जो अपने सर्व-आकर्षक साकार अंशों को इसलिए प्रकट करते है जिससे सारे जीव मुक्ति प्राप्त कर सके (श्रीमद भागवत १0.८७.४६)|

ब्रह्मा: हे प्रभु! यह सारा द्रश्य जगत आपसे उत्पन्न होता है, आप पर टिका रहता है और आपमें लीन हो जाता है | आप ही प्रत्येक वस्तु के आदि,मध्य तथा अंत है | जिस तरह पृथ्वी मिटटी के पात्र का कारण है ; उस पात्र को आधार प्रदान करती है और जब पात्र टूट जाता है तो अंतत: उसे अपने में मिला लेती है (श्रीमद भागवत ८.६.१0) | मै, शिवजी तथा सारे देवताओं के साथ साथ दक्ष जैसे प्रजापति भी चिंगारियां मात्र है जो मूल अग्नि स्वरुप आपके द्वारा प्रकाशित है (श्रीमद भागवत ८.६.१४) |

मैं उन सर्वमंगलमय भगवान कृष्ण को सादर नमस्कार करता हूँ जिनके यशोगान, स्मरण, दर्शन, वंदन, श्रवण तथा पूजन से पाप करने वाले के सारे पाप फल तुरंत नष्ट हो जाते है (श्रीमद भागवत २.४.१५) |

वेदों में ज्ञान का परम लक्ष्य भगवान श्री कृष्ण (वासुदेव) है | यज्ञ करने का उद्देश्य उन्हें ही प्रसन्न करना है | योग उन्ही के साक्षात्कार के लिए है | सारे सकाम कर्म अंततः उन्ही के द्वारा पुरस्कृत होते है | सारी तपस्याये उन्ही को जानने के लिए की जाती है | उनकी प्रेमपूर्ण सेवा करना ही धर्म है और वे ही जीवन के परम लक्ष्य है (श्रीमद भागवत १.२.२८-२९) |
December 27, 2019

धनुर्धर अर्जुन का अहंकार

महाभारत के मुख्य पात्र हैं। महाराज पाण्डु एवं रानी कुन्ती के वह तीसरे पुत्र थे। द्रौपदी, कृष्ण और बलराम की बहन सुभद्रा, नाग कन्या उलूपी और मणिपुर नरेश की पुत्री चित्रांगदा इनकी पत्नियाँ थीं। इनके भाई क्रमशः युधिष्ठिर,
भीम , नकुल , सहदेव ।

अर्जुन सबसे अच्छे धनुर्धर और द्रोणाचार्य के प्रमुख शिष्य थे। जीवन में अनेक अवसर पर उन्होने इसका परिचय दिया। इन्होने द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। कुरूक्षेत्र युद्ध में ये प्रमुख योद्धा थे। अर्जुन ने ही कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से अलौकिक प्रश्न किये जो गीता में वर्णित हैं।

महाराज पाण्डु की दो पत्नियाँ थी कुन्ती तथा माद्री ।मुनि दुर्वासा के वरदान द्वारा धर्मराज , वायुदेव तथा इंद्र का आवाहन कर तीन पुत्र माँगे। इंद्र द्वारा अर्जुन का जन्म हुआ।




द्रोणाचार्य को एेसे योद्धाओं की आवश्यकता थी जो राजा द्रुपद से प्रतिशोध ले सके। इसी कारण वे हस्तिनापुर के 105 राजकुमारों को शिक्षा देने लगे जिसमें से एक अर्जुन भी था।

एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान श्रीकृष्ण के सबसे बड़े भक्त हैं, उनके इस अहंकार को भगवन श्रीकृष्ण ने समझ लिया और फिर एक दिन वे अर्जुन को अपने साथ ऐसे ही घुमाने ले गए।

रास्ते में चलते चलते उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई, उसका व्यवहार कुछ विचित्र सा था, वह सूखी रोटी खा रहा था परन्तु उसकी कमर से तलवार लटक रही थी।

अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो ब्राह्मण देवता है अहिंसा पुजारी , पूजा पाठ वाले हैं। जीव हिंसा न हो इस भय से सूखी रोटी खाकर अपना गुजारा करते हैं, लेकिन फिर यह तलवार क्यों आपके साथ है?’

ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’

‘ आपके शत्रु कौन हैं, और उन्होंने आपका क्या बिगाड़ा है ?’ अर्जुन ने जिज्ञासावश उनसे पूछा|

ब्राह्मण ने आक्रोश से भरी आवाज में कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं।
सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है क्योंकि वो नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं।

फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं, उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ भूखी अवस्था में पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा, उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना तक खिलाया।’

‘ आपका तीसरा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा।'

वह है हृदयहीन प्रह्लाद, उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया।

आपका चौथा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा

और चौथा शत्रु है अर्जुन, उसकी दुष्टता देखिए, उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला, उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा, इतना तो सोच लेते कितना अधिक कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को।’ यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू झलक आये ।

इतना सब सुन धनुर्धर अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया, उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘देख लिया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’
December 27, 2019

विद्वान कालिदास को विद्वता का अभिमान

कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और
नाटककार थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की और उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्त्व निरूपित हैं। कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं और कुछ विद्वान उन्हें राष्ट्रीय कवि का स्थान तक देते हैं।

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था. शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था. अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया.
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उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा. उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं. एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए.
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गर्मी का मौसम था. धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई. थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी. पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले. झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था.
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कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए. उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली. बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी.
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कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके ! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे. बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए. कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ?
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फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके अभी तुम छोटी हो. इसलिए मुझे नहीं जानती. घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो. वह मुझे देखते ही पहचान लेगा. मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक. मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं.
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कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली-आप असत्य कह रहे हैं. संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं. अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं ?
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थोङा सोचकर कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो. मेरा गला सूख रहा है. बालिका बोली- दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’. भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें. देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है.
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कलिदास चकित रह गए. लड़की का तर्क अकाट्य था. बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे. बालिका ने पुनः पूछा- सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी.
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कालिदास थोड़ा नम्र होकर बोले-बालिके ! मैं बटोही हूं. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली- आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं. संसार में दो ही बटोही हैं. उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी.
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बच्ची बोली- आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है. बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं. आप तो थक गए हैं. भूख प्यास से बेदम हैं. आप कैसे बटोही हो सकते हैं ?
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इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई. अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए. इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए. प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी. दिमाग़ चकरा रहा था. उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली.
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उसके हाथ में खाली मटका था. वह कुएं से पानी भरने लगी. अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.
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स्त्री बोली- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो. मैं अवश्य पानी पिला दूंगी. कालिदास ने कहा- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें. स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं. पहला धन और दूसरा यौवन. इन्हें जाने में समय नहीं लगता. सत्य बताओ कौन हो तुम ?
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अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं. अब आप पानी पिला दें. स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं. पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है. उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है.
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दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं. तुम सहनशील नहीं. सच बताओ तुम कौन हो ? कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं.
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स्त्री बोली- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं. सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा- फिर तो मैं मूर्ख ही हूं.
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नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो. मूर्ख दो ही हैं. पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है.
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कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे. वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी. कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए.
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माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार. तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा.
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कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े। 
December 27, 2019

भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु


भगवान दत्तात्रेय ,महर्षि अत्रि और उनकी सहधर्मिणी अनुसूया के पुत्र थे।इनके पिता महर्षि अत्रि सप्तऋषियों में से एक है,और माता अनुसूया को सतीत्व के प्रतिमान के रूप में उदधृत किया जाता है।


भगवान  दत्तात्रेय के 24 गुरु: -

पृथ्वी- सहनशीलता व परोपकार की भावना सीख सकते हैं। पृथ्वी पर लोग कई प्रकार के आघात करते हैं, कई प्रकार के उत्पात होते हैं, कई प्रकार खनन कार्य होते हैं, लेकिन पृथ्वी हर आघात को परोपकार का भावना से सहन करती है।

पिंगला वेश्या- पिंगला नाम की वेश्या से दत्तात्रेय ने सबक लिया कि केवल पैसों के लिए जीना नहीं चाहिए। वह वेश्या सिर्फ पैसा पाने के लिए किसी भी पुरुष की ओर इसी नजर से देखती थी वह धनी है और उससे धन प्राप्त होगा। धन की कामना में वह सो नहीं पाती थी। जब एक दिन पिंगला वेश्या के मन में वैराग्य जागा तब उसे समझ आया कि पैसों में नहीं बल्कि परमात्मा के ध्यान में ही असली सुख है, तब उसे सुख की नींद आई।

कबूतर- कबूतर का जोड़ा जाल में फंसे बच्चों को देखकर खुद भी जाल में जा फंसता है। इनसे यह सबक लिया जा सकता है कि किसी से बहुत ज्यादा स्नेह दु:ख ही वजह होता है।

सूर्य- सूर्य से दत्तात्रेय ने सीखा कि जिस तरह एक ही होने पर भी सूर्य अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग दिखाई देता है। आत्मा भी एक ही है, लेकिन कई रूपों में दिखाई देती है।

वायु- जिस प्रकार अच्छी या बुरी जगह पर जाने के बाद वायु का मूल रूप स्वच्छता ही है। उसी तरह अच्छे या बुरे लोगों के साथ रहने पर भी हमें अपनी अच्छाइयों को छोडऩा नहीं चाहिए।

हिरण- हिरण उछल-कूद, संगीत, मौज-मस्ती में इतना खो जाता है कि उसे अपने आसपास शेर या अन्य किसी हिसंक जानवर के होने का आभास ही नहीं होता है और वह मारा जाता है। इससे यह सीखा जा सकता है कि हमें कभी भी मौज-मस्ती में इतना लापरवाह नहीं होना चाहिए।

समुद्र- जीवन के उतार-चढ़ाव में भी खुश और गतिशील रहना चाहिए।

पतंगा- जिस प्रकार पतंगा आग की ओर आकर्षित होकर जल जाता है। उसी प्रकार रूप-रंग के आकर्षण और झूठे मोह में उलझना नहीं चाहिए।

हाथी- हाथी हथिनी के संपर्क में आते ही उसके प्रति आसक्त हो जाता है। अत: हाथी से सीखा जा सकता है कि संयासी और तपस्वी पुरुष को स्त्री से बहुत दूर रहना चाहिए।

आकाश- दत्तात्रेय ने आकाश से सीखा कि हर देश, काल, परिस्थिति में लगाव से दूर रहना चाहिए।

जल- दत्तात्रेय ने जल से सीखा कि हमें सदैव पवित्र रहना चाहिए।

मधुमक्खी – मधुमक्खियां शहद इकट्ठा करती है और एक दिन छत्ते से शहद निकालने वाला सारा शहद ले जाता है। इस बात से ये सीखा जा सकता है कि आवश्यकता से अधिक चीजों को एकत्र करके नहीं रखना चाहिए।

मछली- हमें स्वाद का लोभी नहीं होना चाहिए। मछली किसी कांटे में फंसे मांस के टुकड़े को खाने के लिए चली जाती है और अंत में प्राण गंवा देती है। हमें स्वाद को इतना अधिक महत्व नहीं देना चाहिए, ऐसा ही भोजन करें जो सेहत के लिए अच्छा हो।

कुरर पक्षी- कुरर पक्षी से सीखना चाहिए कि चीजों को पास में रखने की सोच छोड़ देना चाहिए। कुरर पक्षी मांस के टुकड़े को चोंच में दबाए रहता है, लेकिन उसे खाता है। जब दूसरे बलवान पक्षी उस मांस के टुकड़े को देखते हैं तो वे कुरर से उसे छिन लेते हैं। मांस का टुकड़ा छोड़ने के बाद ही कुरर को शांति मिलती है।

बालक- छोटे बच्चे से सीखा कि हमेशा चिंतामुक्त और प्रसन्न रहना चाहिए।

आग- आग से दत्तात्रेय ने सीखा कि कैसे भी हालात हों, हमें उन हालातों में ढल जाना चाहिए। जिस प्रकार आग अलग-अलग लकडिय़ों के बीच रहने के बाद भी एक जैसी ही नजर आती है।

चन्द्रमा- आत्मा लाभ-हानि से परे है। वैसे ही जैसे घटने-बढऩे से भी चंद्रमा की चमक और शीतलता बदलती नहीं है, हमेशा एक-जैसे रहती है। आत्मा भी किसी भी प्रकार के लाभ-हानि से बदलती नहीं है।

कुमारी कन्या- कुमारी कन्या से सीखना चाहिए कि अकेले रहकर भी काम करते रहना चाहिए और आगे बढ़ते रहना चाहिए। दत्तात्रेय ने एक कुमारी कन्या देखी जो धान कूट रही थी। धान कूटते समय उस कन्या की चूडिय़ां आवाज कर रही थी। बाहर मेहमान बैठे थे, जिन्हें चूडिय़ों की आवाज से परेशानी हो रही थी। तब उस कन्या ने चूडिय़ों आवाज बंद करने के लिए चूडिय़ां ही तोड़ दी। दोनों हाथों में बस एक-एक चूड़ी ही रहने दी। इसके बाद उस कन्या ने बिना शोर किए धान कूट लिया। अत: हमें ही एक चूड़ी की भांति अकेले ही रहना चाहिए।

शरकृत या तीर बनाने वाला- अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करना चाहिए। दत्तात्रेय ने एक तीर बनाने वाला देखा जो तीर बनाने में इतना मग्न था कि उसके पास से राजा की सवारी निकल गई, पर उसका ध्यान भंग नहीं हुआ।

सांप- दत्तात्रेय ने सांप से सीखा कि किसी भी संयासी को अकेले ही जीवन व्यतीत करना चाहिए। साथ ही, कभी भी एक स्थान पर रुककर नहीं रहना चाहिए। जगह-जगह ज्ञान बांटते रहना चाहिए।

मकड़ी- मकड़ी से दत्तात्रेय ने सीखा कि भगवान भी माय जाल रचते हैं और उसे मिटा देते हैं। जिस प्रकार मकड़ी स्वयं जाल बनाती है, उसमें विचरण करती है और अंत में पूरे जाल को खुद ही निगल लेती है, ठीक इसी प्रकार भगवान भी माया से सृष्टि की रचना करते हैं और अंत में उसे समेट लेते हैं।

भृंगी कीड़ा- इस कीड़े से दत्तात्रेय ने सीखा कि अच्छी हो या बुरी, जहां जैसी सोच में मन लगाएंगे मन वैसा ही हो जाता है।

भौंरा – भौरें से दत्तात्रेय ने सीखा कि जहां भी सार्थक बात सीखने को मिले उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। जिस प्रकार भौरें अलग-अलग फूलों से पराग ले लेती है।

अजगर- अजगर से सीखा कि हमें जीवन में संतोषी बनना चाहिए। जो मिल जाए, उसे ही खुशी-खुशी स्वीकार कर लेना चाहिए।

"आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः
मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते।
ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले
प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते।।"

भावार्थ -

"जो आदि में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अन्त में सदाशिव है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है। ब्रह्मज्ञान जिनकी मुद्रा है, आकाश और भूतल जिनके वस्त्र है तथा जो साकार प्रज्ञानघन स्वरूप है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है।" (जगद्गुरु श्री आदि शंकराचार्य)


December 27, 2019

Yamraj aur Nachiketa samvaad: यमराज और नचिकेता का संवाद


कठोउपनिषद मे यमराज और नचिकेता का संवाद
प्रथम अध्याय: -




इस अध्याय में नचिकेत अपने पिता द्वारा प्रताड़ित किये जाने पर यम के यहाँ पहुंचता है और यम की अनुपस्थिति में तीन दिन तक भूखा-प्यास यम के द्वार पर बैठा रहता है। तीन दिन बाद जब यम लौटकर आते हैं, तब उनकी पत्नी उन्हें ब्राह्मण बालक अतिथि के विषय में बताती है। यमराज बालक के पास पहुंचकर अपनी अनुपस्थिति के लिए नचिकेता से क्षमा मांगते हैं और उसे इसके लिए तीन वरदान देने की बात कहते हैं। वे उसे उचित सम्मान देकर व भोजन आदि कराके भी सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। तदुपरान्त नचिकेता द्वारा वरदान मांगने पर 'अध्यात्म' के विषय में उसकी जिज्ञासा शान्त करते हैं।

प्रथम वल्ली
कथा इस प्रकार है कि किसी समय वाजश्रवा ऋषि के पुत्र वाजश्रवस उद्दालक मुनि ने विश्वजित यज्ञ करके अपना सम्पूर्ण धन और गौएं दान कर दीं। जिस समय ऋत्विजों द्वारा दक्षिणा में प्राप्त वे गौएं ले जाई जा रही थीं, तब उन्हें देखकर वाजश्रवस उद्दालक मुनि का पुत्र नचिकेता सोच में पड़ गया; क्योंकि वे गौएं अत्यधिक जर्जर हो चुकी थीं। वे न तो दूध देने योग्य थीं, न प्रजनन के लिए उपयुक्त थीं। उसने सोचा कि इस प्रकार की गौओं को दान करना दूसरों पर भार लादना है। इससे तो पाप ही लगेगा।

ऐसा विचार कर नचिकेता ने अपने पिता से कहा-'हे तात! इससे अच्छा तो था कि आप मुझे ही दान कर देते।'
बार-बार ऐसा कहने पर पिता ने क्रोधित होकर कह दिया-'मैं तुझे मृत्यु को देता हूं।'

पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए नचिकेता यम के द्वार पर जा पहुंचा और तीन दिन तक भूखा-प्यासा पड़ा रहा। जब यम ने उसे वरदान देने की बात कही, तो उसने पहला वरदान मांगा।

पहला वरदान
'हे मृत्युदेव! जब मैं आपके पास से लौटकर घर जाऊं, तो मेरे पिता क्रोध छोड़, शान्त चित्त होकर, मुझसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करें और अपनी शेष आयु में उन्हें कोई चिन्ता न सताये तथा वे सुख से सो सकें।' यमराज ने 'तथास्तु, 'अर्थात 'ऐसा ही हो' कहकर पहला वरदान दिया।

दूसरा वरदान
'हे मृत्युदेव! आप मुझे स्वर्ग के साधनभूत उस 'अग्निज्ञान' को प्रदान करें, जिसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए पुरुष अमरत्व को प्राप्त करते हैं।' यमराज ने नचिकेता को उपदेश देते हुए कहा-'हे नचिकेता! तुम इस 'अग्निविद्या' को एकाग्र मन से सुनो। स्वर्गलोक को प्राप्त कराने वाली यह विद्या अत्यन्त गोपनीय है।' तदुपरान्त यमराज ने नचिकेता को समझाया कि ऐसा यज्ञ करने के लिए कितनी ईंटों की वेदी बनानी चाहिए और यज्ञ किस विधि से किया जाये तथा कौन-कौन से मन्त्र उसमें बोले जायें। अन्त में नचिकेता की परीक्षा लेने के लिए यमराज ने उससे अपने द्वारा बताये यज्ञ का विवरण पूछा, तो बालक नचिकेता ने अक्षरश: उस विधि को दोहरा दिया। उसे सुनकर यमराज बालक की स्मरणशक्ति और प्रतिभा को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-'हे नचिकेता! तेरे मांगे गये तीन वरदानों के अतिरिक्त मैं तुम्हें एक वरदान अपनी ओर से यह देता हूं कि मेरे द्वारा कही गयी यह 'अग्निविद्या' आज से तुम्हारे नाम से जानी जायेगी। तुम इस अनेक रूपों वाली, ज्ञान-तत्त्वमयी माला को स्वाकर करो।'

नचिकेता को दिव्य 'अग्निविद्या' प्राप्त हुई। इसलिए उस विद्या का नाम 'नचिकेताग्नि' (लिप्त न होने वाले की विद्या) पड़ा। इस प्रकार की त्रिविध 'नचिकेत' विद्या का ज्ञाता, तीन सन्धियों को प्राप्त कर, तीन कर्म सम्पन्न करके जन्म-मृत्यु से पार हो जाता है और परम शान्ति प्राप्त करता है। आचार्यों ने नचिकेत विद्या को 'प्राप्ति,' 'अध्यायन' और 'अनुष्ठान' तीन विधियों से युक्त कहा है। साधक को इन तीनों के साथ आत्म-चेतना की सन्धि करनी पड़ती है, अर्थात स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर को इस विद्या से अनुप्राणित करना पड़ता है। इस प्रक्रिया को 'त्रिसन्धि' प्राप्ति कहा जाता है। कुछ आचार्य माता-पिता और गुरु से युक्त होने को त्रिसन्धि' कहते हैं। इन सभी को दिव्याग्नि के अनुरूप ढालते हुए साधक जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। अब उसने यमराज से तीसरा वर मांगा।

तीसरा वरदान
'हे मृत्युदेव! मनुष्य के मृत हो जाने पर आत्मा का अस्तित्त्व रहता है, ऐसा ज्ञानियों का कथन है, परन्तु कुछ की मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व नहीं रहता। आप मुझे इस सन्देह से मुक्त करके बतायें कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा का क्या होता है?' नचिकेता के तीसरे वरदान को सुनकर यमराज ने उसे समझाया कि यह विषय अत्यन्त गूढ़ हैं इसके बदले वे उसे समस्त विश्व की सम्पदा और साम्राज्य तक दे सकते हैं, किन्तु वह यह न पूछे कि मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है; क्योंकि इसे जानना और समझना अत्यन्त अगम्य है, परन्तु नचिकेता किसी भी रूप में यमराज के प्रलोभन में नहीं आया और अपने मांगे हुए वरदान पर ही अड़ा रहा।

द्वितीय वल्ली
यमराज ने नचिकेता के हठ हो देखा, तो कहा-'हे नचिकेता!'कल्याण' और 'सांसारिक भोग्य पदार्थों' का मार्ग अलग-अलग है। ये दोनों ही मार्ग मनुष्य के सम्मुख उपस्थित होते हैं, किन्तु बुद्धिमान जन दोनों को भली-भांति समझकर उनमें से एक अपने लिए चुन लेते हैं। जो अज्ञानी होते हैं, वे भोग-विलास का मार्ग चुनते हैं और जो ज्ञानी होते हैं, वे कल्याण का मार्ग चुनते हैं। प्रिय नचिकेता! श्रेष्ठ आत्मज्ञान को जानने का सुअवसर बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। इसे शुष्क तर्कवितर्क से नहीं जाना जा सकता।'

यमराज ने बताया-'प्रिय नचिकेता! 'ॐ' ही वह परमपद है। 'ॐ' ही अक्षरब्रह्म है। इस अक्षरब्रह्म को जानना ही 'आत्माज्ञान' है। साधक अपनी आत्मा से साक्षात्कार करके ही इसे जान पाता है; क्योंकि आत्मा ही 'ब्रह्म' को जानने का प्रमुख आधार है। एक साधक मानव-शरीर में स्थित इस आत्मा को ही जानने का प्रयत्न करता है।'

'न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥' 
-1/2/18॥ 

अर्थात यह नित्य ज्ञान-स्वरूप आत्मा न तो उत्पन्न होता है और न मृत्यु को ही प्राप्त होता है। यह आत्मा न तो किसी अन्य के द्वारा जन्म लेता है और न कोई इससे उत्पन्न होता है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत औ क्षय तथा वृद्धि से रहित है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह विनष्ट नहीं होता।

'हे नचिकेता! परमात्मा इस जीवात्मा के हृदय-रूपी गुफ़ा में अणु से भी अतिसूक्ष्म और महान् से भी अतिमहान रूप में विराजमान हैं। निष्काम कर्म करने वाला तथा शोक-रहित कोई विरला साधक ही, परमात्मा को कृपा से उसे देख पाता है। दुष्कर्मों से युक्त, इन्द्रियासक्त और सांसारिक मोह में फंसा ज्ञानी व्यक्ति भी आत्मतत्त्व को नहीं जान सकता।'

तृतीय वल्ली
'हे नचिकेता! जो विवेकशील है, जिसने मन सहित अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में कर लिया है, जो सदैव पवित्र भावों को धारण करने वाला है, वही उस आत्म-तत्त्व को जान पाता है; क्योंकि—
'एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते। 
दृश्यते त्वग्रय्या बुद्धिया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:॥' 
-1/3/12॥

 अर्थात समस्त प्राणियों में छिपा हुआ यह आत्मतत्त्व प्रकाशित नहीं होता, वरन् यह सूक्ष्म दृष्टि रखने वाले तत्त्वदर्शियों को ही सूक्ष्म बुद्धि से दिखाई देता है।

दूसरा अध्याय
दूसरे अध्याय में परमेश्वर की प्राप्ति में जो बाधाएं आती हैं, उनके निवारण और हृदय में उनकी स्थिति का वर्णन किया गया है। परमात्मा की सर्वव्यापकता और संसार-रूपी उलटे पीपल के वृक्ष का विवेचन, योग-साधना, ईश्वर-विश्वास और मोक्षादि का वर्णन है। अन्त में ब्रह्मविद्या के प्रभाव से नचिकेता को ब्रह्म-प्राप्ति का उल्लेख है।

प्रथम वल्ली
परमात्मा ने समस्त इन्द्रियों का मुख बाहर की ओर किया है, जिससे जीवात्मा बाहरी पदार्थों को देखता है और सांसारिक भोग-विलास में ही उसका ध्यान रमा रहता है। वह अन्तरात्मा की ओर नहीं देखता, किन्तु मोक्ष की इच्छा रखने वाला साधक अपनी समस्त इन्द्रियों पर नियन्त्रण करके अन्तरात्मा को देखता है। यह अन्तरात्मा ही ब्रह्म तक पहुंचने का मार्ग है। जहां से सूर्यदेव उदित होते हैं और जहां तक जाकर अस्त होते हैं, वहां तक समस्त देव शक्तियां विराजमान हैं। उन्हें कोई भी नहीं लांघ पाता। यही ईश्वर है। इस ईश्वर को जानने के लिए सत्य और शुद्ध मन की आवश्यकता होती है।

यमराज नचिकेता को बताते हैं-'हे नचिकेता! शुद्ध जल को जिस पात्र में भी डालो, वह उसी के अनुसार रूप ग्रहण कर लेता है। पौधों में वह रस, प्राणियों में रक्त और ज्ञानियों में चेतना का रूप धारण कर लेता है। उसमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। वह शुद्ध रूप से किसी के साथ भी एकरूप हो जाता हैं जो साधक सभी पदार्थों से अलिप्त होकर परमात्मतत्त्व से लिप्त होने का प्रयास करता है, उस साधक को ही सत्य पथ का पथिक जानकर 'आत्मतत्त्व' का उपदेश दिया जाता है।'

द्वितीय वल्ली
'हे नचिकेता! उस चैतन्य और अजन्मा परब्रह्म का नगर ग्यारह द्वारों वाला है- दो नेत्र, दो कान, दो नासिका रन्ध्र, एक मुख, नाभि, गुदा, जननेन्द्रिय और ब्रह्मरन्ध्र। ये सभी द्वार शरीर में स्थित हैं। कर्म-बन्धनों से मुक्त होकर, जो साधक द्वारों के मोह से सर्वथा अलिप्त रहकर नगर में प्रवेश करता है, वह निश्चय ही परमात्मा तक पहुचता हैं शरीर में स्थित एक देह से दूसरी देह में गमन करने के स्वभाव वाला यह जीवात्मा, जब मृत्यु के उपरान्त दूसरे शरीर में चला जाता है, तब कुछ भी शेष नहीं रहता। यह गमनशील तत्त्व ही ब्रह्म है। यही जीवन का आधार है। प्राण और अपान इसी के आश्रय में रहते हैं। अब मैं तुम्हें बताऊंगा कि मृत्यु के उपरान्त आत्मा का क्या होता है, अर्थात वह कहां चला जाता है।'यमराज ने आगे कहा-

'योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिन:।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥2/2/7॥'

अर्थात अपने-अपने कर्म और शास्त्राध्ययन के अनुसार प्राप्त भावों के कारण कुछ जीवात्मा तो शरीर धारण करने के लिए विभिन्न योनियों को प्राप्त करते हैं और अन्य अपने-अपने कर्मानुसार जड़ योनियों, अर्थात वृक्ष, लता, पर्वत आदि को प्राप्त करते हैं।

'हे नचिकेता! समस्त जीवों के कर्मानुसार उनकी भोग-व्यवस्था करने वाला परमपुरुष परमात्मा, सबके सो जाने के उपरान्त भी जागता रहता है। वही विशुद्ध तत्त्व परब्रह्म अविनाशी कहलाता है, जिसे कोई लांघ नहीं सकता। समस्त लोक उसी का आश्रय ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार एक ही अग्नितत्त्व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रवेश करके प्रत्येक आधारभूत वस्तु के अनुरूप हो जाता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियों में स्थित अन्तरात्मा(ब्रह्म) एक होने पर भी अनेक रूपों में प्रतिभासित होता है। वही भीतर है और वही बाहर है।

'एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य: करोति।'

तृतीय वल्ली
इस वल्ली में यमराज ब्रह्म की उपमा पीपल के उस वृक्ष से करते हैं, जो इस ब्रह्माण्ड के मध्य उलटा लटका हुआ है। जिसकी जड़े ऊपर की ओर हैं और शाखाएं नीचे की ओर लटकी हैं या फैली हुई हैं। यह वृक्ष सृष्टि का सनातन वृक्ष है। यह विशुद्ध, अविनाशी और निर्विकल्प ब्रह्म का ही रूप है।
यमराज बताते हैं कि यह सम्पूर्ण विश्व उस प्राण-रूप ब्रह्म से ही प्रकट होता है और निरन्तर गतिशील रहता है। जो ऐसे ब्रह्म को जानते हैं, वे ही अमृत्य, अर्थात मोक्ष को प्राप्त करते हैं इस परब्रह्म के भय से ही अग्निदेव तपते हैं, सूर्यदेव तपते हैं। इन्द्र, वायु और मृत्युदेवता भी इन्हीं के भय से गतिशील रहते हैं।
'हे नचिकेता ! मृत्यु से पूर्व, जो व्यक्ति ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह जीव समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है, अन्यथा विभिन्न योनियों में भटकता हुआ अपने कर्मों का फल प्राप्त करता रहता है। यह अन्त:करण विशुद्ध दर्पण के समान है। इसमें ही ब्रह्म के दर्शन किये जा सकते हैं। जब मन के साथ सभी इन्द्रियां आत्मतत्त्व में लीन हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टारहित हो जाती हे, तब इसे जीव की 'परमगति' कहा जाता है। इन्द्रियों का संयम करके आत्मा में लीन होना ही 'योग' है। हृदय की समस्त ग्रन्थियों के खुल जाने से मरणधर्मा मनुष्य अमृत्व, अर्थात 'मोक्ष' को प्राप्त कर लेता है।' ऐसी विद्या को जानकर नचिकेता बन्धनमुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हो गया।